Saturday, May 30, 2020

आज़ादी को छीने जाने की पीड़ा।




आज मैं 22 साल की हो गई हूँ लेकिन गहरे दुःख और आँखों में आँसुओं के साथ मैं बता रही हूँ कि मेरे 22 वर्ष की आयु में मेरे 20 वर्ष बंदी के तौर पर गुज़रे और अब भी मैं बंदी का दुःख झेल रही हूँ। दूसरे शब्दों में मेरा पूरा जीवन बंदी के तौर पर गुज़रा और मैं नहीं जानती की आज़ादी क्या होती है क्योंकि अपनी पैदाइश के दो वर्ष बाद मुझे अपने माता-पिता और अपने समाज से एक लालची बहेलिये द्वारा अलग कर दिया गया जो परिंदों को पकड़कर उनकी तिज़ारत (क़ारोबार) करता है। अब आप सभी लोग मेरी आज़ादी को खोने की पीड़ा को समझ सकते हैं। मेरा सारा जीवन ये सोचते हुए दुःख और पीड़ा में गुज़रा कि क्या मैं कभी आज़ाद हो पाऊँगी और आज़ादी की फ़िज़ा (माहौल) में साँस ले पाऊँगी। मेरा हर दिन आँखों में आँसू के साथ सोचते हुए गुज़रा कि मेरा कभी ना ख़त्म होने वाला बंदी का जीवन आज़ादी के जीवन में बदल पाएगा? वास्तव में मैं ना तो आज़ादी का मतलब जानती हूँ और ना ही आज़ादी का एहसास। लेकिन मैं आज़ादी के सुख और आनन्द की कल्पना कर सकती हूँ। जिससे मैं वंचित कर दी गई हूँ और आज़ादी के सुख और आनंद को भोग नहीं सकती। आप सभी लोग जो मेरी इस कहानी को सुन रहे है वें भलीभाँति आज़ादी, स्वतंत्रता और मुक्ति का अर्थ जानते हैं। आप सभी लोग आज़ादी, स्वतंत्रता और मुक्ति के माहौल में आनंद उठा रहे है। अगर आपको आज़ादी, स्वतंत्रता और मुक्ति के माहौल से एक दिन भी वंचित कर दिया जाए तो इनके बिना आप एक दिन भी जीवित नहीं रह सकते। आप लोग आज़ादी, स्वतंत्रता और मुक्ति के लिए लड़ाई शुरू कर देते हो और इन्हें पाने के लिए बेचैन रहते हो। आज़ादी, स्वतंत्रता और मुक्ति प्राप्त करने से संबंधित आपकी लड़ाई कामयाब हो जाती है और आप इसे प्राप्त करने में सफ़ल हो जाते हैं। ये बड़े दुःख की बात है कि मैं अपने बंदी होने का विरोध नहीं कर सकती इसलिए मैं अपनी आज़ादी हासिल नहीं कर सकती। इसलिए कि मैं इंसान नहीं हूँ बल्कि एक तोती हूँ जिसे जबरन बंदी बनाकर रखा गया है जिसे ये मालूम नहीं कि अपनी आज़ादी, स्वतंत्रता और मुक्ति से वंचित कर दिए जाने का विरोध कैसे करूँ? मुझे बंदी बना लिए जाने के बाद इंसान को मेरी आज़ादी खोने का एहसास तक नही होता। इसके विपरीत वह मुझे पिंजरे में रखकर ख़ुश होता है। इस प्रकार मुझे पिंजरे में देखकर उसे संतुष्टि प्राप्त होती है। इंसान इतना क्रूर है कि वो हमें (तोतों) को खरीद कर घर लाता है और फिर हमें पिंजरे में क़ैद कर देता है। जिसके कारण एक तरफ़ तो हमें अपनी आज़ादी से महरूम कर दिया जाता है और दूसरी तरफ़ हमें तकलीफ़ और यातनाएँ सहने के लिए मज़बूर कर दिया जाता है। पिंजरे में जो हमें सबसे ज़्यादा तक़लीफ़ और यातना सहनी पड़ती है वो हमारा लगातार खड़ा रहना होता है। क्योंकि हम जबतक पिंजरे में रहते हैं तबतक हमें खड़े होने वाली तक़लीफ़ और यातना को सहना पड़ता है जोकि असहनीय होती है। हम इस तक़लीफ़ और यातना को ख़ामोशी से सहते रहते हैं क्योंकि हमें अपनी तक़लीफ़ के ख़िलाफ़ विरोध करना नहीं आता। इंसान हमारी इस तक़लीफ़ के बारे में बिलकुल नहीं सोचता बल्कि इसके विपरीत वो समझता है कि हम इस पिंजरे में हँसी-ख़ुशी से रहते हैं। काश! कि इंसानों को हमारे पैरों की तक़लीफ़ और यातना को किसी तरह कोई बताता ताकि लोग हमें पिंजरे में क़ैद करके पालना छोड़ दे। जब हम आज़ाद होते हैं तो हम लगातार कभी खड़े नहीं रहते हैं। हम दिनभर इधर-उधर उड़ते रहते हैं और रात को अपने ठिकाने पर खड़े होकर सोते है। ऐसी स्थिति में हमें लगातार खड़े होने की तक़लीफ़ और यातना नहीं सहनी पड़ती है। यहाँ मैं इंसानों से सवाल करती हूँ कि वो बगैर किसी तकलीफ और यातना सहे बिना कितनी देर अपने पैरों पर खड़े रह सकते हैं? इस कहानी के ज़रिये ये निश्चित है कि इंसान इस नतीजे पर पहुँचेगा कि हम जैसे नन्हे परिंदों को पिंजरे में क़ैद नहीं रखना चाहिए। क़ैद में रहने के दौरान मैं हर वक़्त ये सोचती हूँ कि मैं आज़ाद कैसे हो जाऊँ? मेरे बहुत से साथी भाग्यशाली हैं, जिन्हें क़ैद से निकल भागने का मौका मिला। वें अपने समाज में जा मिले और आज़ादी का जीवन गुज़ारने लगे। ये दुःख की बात है कि इंसान तोते को पिंजरे में क़ैद करने के बाद उन्हें अपनी इच्छा से आज़ाद नहीं करता। सवाल यह उठता है कि हम तोतों को क़ैद में रखने के लिए कौन ज़िम्मेदार है? इसका बिलकुल सीधा जवाब यह है कि वो लोग इसके ज़िम्मेदार है जो तोतों को ख़रीदकर पिंजरे में रखते हैं और इस तरह तोतों को एक आदमी बेचता है और दूसरा उनको ख़रीदता है। इस प्रकार तोतों की क़ैद की ज़िन्दगी की शुरुआत होती है इसलिए इंसानों से मेरा यह अनुरोध है कि वें तोतों को पिंजरे में क़ैद में रखने की इच्छा को त्याग दें ताकि सभी तोतें आज़ादी से रह सके और उन्हें अपनी आज़ादी से वंचित न किया जाए। मुझे आशा है कि मेरे इस अनुरोध को ठुकराया नहीं जाएगा और सभी इंसान ना सिर्फ़ मेरे इस अनुरोध का सम्मान करेंगे बल्कि अपने दूसरे साथियों से भी मेरे इस अनुरोध पर ध्यान देने के लिए कहेंगे।

जब पिंजरे में मैं अपने आज़ादी के दिनों को याद करती हूँ तो मुझे बहुत मायूसी होती है और तब अपनी क़ैद को याद कर और आज़ाद ना हो पाने की अपनी बेबसी को सोचकर मेरा दिल रो पड़ता है। जब मैं आज़ाद थी और इसका आनंद ले रही थी और अपने साथियों के साथ हँसी-ख़ुशी रह रही थी तो उस समय मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं क़ैद कर ली जाऊँगी और पिंजरे में बंद कर दी जाऊँगी। उस समय मैं अपने परिवार और अपने साथियों के साथ रहती थी और इधर-उधर हँसी-ख़ुशी उड़ती-फिरती थी। सुबह उठने के बाद मैं अपने परिवारवालों और अपने साथियों के साथ खाने की तलाश में दूर निकल जाती थी और कोई बाग़ मिलने पर हम सब पेड़ों पर उतर जाते और वहाँ जो कुछ खाने को मिलता हम खाते। इस दौरान हम आपस में हँसी-मज़ाक भी करते। कभी हम अपने साथियों से लड़ते और जब कोई साथी नाराज़ हो जाता तो उसकी नाराज़गी को दूर करने की कोशिश करते और जब उसकी नाराज़गी ख़त्म हो जाती तब हम ख़ुश हो जाते। कभी-कभी हम झुँड में गीत गाते और कभी हम अपने परिवारवालों से बात करते और कभी हम अपना सुख-दुःख आपस में बांटते। यह वो समय था जब हम जहाँ चाहते वहाँ उड़कर चले जाते। उस वक़्त हम पर कोई पाबंदी नहीं होती थी। यद्दपि उन दिनों हमें बिल्ली, बाज़, चील और साँप जैसे अपने दुश्मनों का शिकार बन जाने का डर लगा रहता था। फिर भी हम ऐसे माहौल में रहकर ख़ुश थे। इसके अलावा हम हर मौसम की सख़्तियों को भी झेलते थे। इन सब के बावजूद हम ख़ुश रहते थे और हम अपनी आज़ाद ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए ईश्वर के शुक्रगुज़ार थे। वास्तव में आज़ादी ईश्वर के सभी जीवों के लिए बहुत क़ीमती चीज़ है। इंसान को आज़ादी पसंद होती है इसलिए वो आज़ाद रहना चाहता है।

अब जबकि मैं क़ैद का जीवन गुज़ार रही हूँ तो ऐसी स्थिति में मैं अपनी आज़ादी के बारे में सोचती हूँ और मेरी इच्छा है कि मैं अपने पिंजरे से बाहर आकर आसमान की ऊँचाइयों पर उडूं और अपने साथियों के पास जाकर उनके साथ समय बिताऊँ। यह स्थिति बहुत ही आनंदपूर्ण है जिन्हें शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। मुझे इस आनंदपूर्ण स्थिति से वंचित कर क़ैद में डाल दिया गया है। मैं ख़ुद से सवाल करती हूँ कि क्या मैं कभी आज़ाद हो पाऊँगी। यह सवाल मैं अपने आप से बार-बार करती हूँ। लेकिन मुझे इस सवाल का ज़वाब नहीं मिलता। मैं यह मान चुकी हूँ कि मेरा अब सारा जीवन क़ैद में ही गुज़रेगा। इस प्रकार मैं सोचती हूँ कि दुनिया के सभी तोतों में मैं सबसे दुर्भाग्यशाली हूँ जो क़ैद में इतना लम्बा जीवन गुज़ार दे और मर जाए। मैं आप सबको यह बताना चाहती हूँ कि पिंजरे में मेरी क़ैद की ज़िंदगी दुखदायी नहीं रही है क्योंकि जिस व्यक्ति ने मुझे पाला वो बाजार से एक तोता ख़रीद लाया और उसे मेरे पिंजरे में डाल दिया। एक-दो दिनों में हम दोनों दोस्त बन गए और इस प्रकार मेरा अकेलापन ख़त्म हो गया और अब मैं ख़ुशी के साथ रहने लगी। यह दुर्भाग्य की बात है कि मेरी खुशियाँ जल्दी ख़त्म हो गई क्योंकि मेरा साथी उस समय छत के पँखे से टकराकर मर गया जब वो पिंजरे से बाहर था। आप कल्पना कर सकते हैं कि मैं अपने साथी के मरने पर कितनी दुखी हुई होऊँगी। मेरा अकेलापन फ़िर शुरू हो गया और मैं ये सोचने लगी कि मेरा ये अकेलापन ज़िन्दगी भर रहेगा। लेकिन ईश्वर का शुक्र है कि मुझे पालने वाला व्यक्ति एक और तोता ले आया और उसे मेरे पिंजरे में डाल दिया। हम दोनों जल्दी दोस्त बन गए। तब मुझे लगा कि आज़ादी खोने की पीड़ा समाप्त हो गई। मेरा नया साथी मुझे बहुत प्यार करता था और उसके प्यार ने मेरे पिछले सभी दुखों को भुला दिया। अपने नए साथी के साथ मेरे अगले 10 साल ख़ुशी के साथ गुज़र गए। इस दौरान मैं अपनी क़ैद की ज़िन्दगी को भूल गई क्योंकि मैंने अपने नए साथी के साथ ज़िंदगी गुज़ारने का लुत्फ़ उठाया। मैं सोचती थी कि ख़ुशी के मेरे ये दिन हमेशा रहेंगे लेकिन मेरी ये सोच ग़लत साबित हुई क्योंकि मेरा ये दूसरा साथी मेरे साथ 10 साल रहने के बाद एक दिन पिंजरे से भाग गया जिससे मेरे दिल पर ऐसी गहरी चोट लगी जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। अब मैं ग़हरी निराशा का सामना कर रही हूँ और इस नतीजे पर पहूँची हूँ कि मेरा बाकी सारा जीवन इस पिंजरे में अकेले ही गुज़रेगा। मैं ये सोचती हूँ कि मेरा नया साथी बहुत ही भाग्यशाली था जोकि पिंजरे से निकल भागने के प्रयास में सफ़ल हो गया। मैं दुआ कर रही हूँ कि वह दोबारा पकड़ा ना जाए और ना ही पिंजरे की क़ैद में रखा जाए। आप लोग यह कल्पना भी नहीं कर सकते कि मैं कितनी दुखी हूँ। अब मैं अपने नए साथी के साथ गुज़ारे दिनों को याद करके बिता रही हूँ और मेरी हालत यह हो गई कि मेरे आसपास होने वाली घटनाओं का मुझे एहसास तक नहीं हो रहा। अब मैं पिंजरे से निकल भागे अपने साथी को हर समय याद करती हूँ और उसे बुलाती रहती हूँ कि वो मेरी आवाज़ सुन लेगा और वो एक दिन मेरे पास आ जाएगा। उसे अपने पिंजरे में ना पाकर मेरा दिल बेहद दुखी हो जाता है और तब मेरा दिल उसके लिए रो पड़ता है और घंटों मैं बिलख़ती रहती हूँ। वास्तव में उससे अलग होने के बाद मेरी दुनिया सुनसान हो गई है। मेरा जीवन अब कितना बाक़ी है यह तो ईश्वर जानता है? लेकिन मैं अपने साथी के बग़ैर कैसे रहूंगी? अब मेरे साथी को मुझसे अलग हुए 2 महीने गुज़र गए हैं लेकिन वो अब भी मेरे पास वापस नहीं आया। इस स्थिति में मैं सोचती हूँ कि मै क्यों नहीं अपने साथी के पास उड़कर चली जाऊँ लेकिन मैं उड़ने में असमर्थ हूँ फिर भी मैं उड़ने की कोशिश करती हूँ। मेरी यह बहुत ही दयनीय स्थिति है कि मैं उड़ भी नहीं सकती। इससे मैं और ज़्यादा दुखी हो जाती हूँ कि मैं अपने साथी के पास उड़कर नहीं जा सकती। बात यह है कि 22 साल पहले जब मुझे पालने वाला व्यक्ति मुझे ख़रीदकर अपने घर लाया तो उसने मेरे परों को क़तर दिया। उसी समय से मैं उड़ने में असमर्थ हो गई और फ़िर मैंने ये समझ लिया कि अब मैं कभी उड़ नहीं सकती क्योंकि उसके बाद मैंने कभी उड़ने की कोशिश भी नहीं की। इस बीच मुझे अपने पालने वाले व्यक्ति से गहरा लगाव हो गया जिसके ज़वाब में वह भी मुझे चाहने लगा। इसलिए भी मैंने कभी उड़कर निकल जाने का विचार नहीं किया। अब मैं उड़कर निकल जाने की कोशिश कर रही हूँ लेकिन मैं उड़ नहीं पा रही हूँ। वास्तव में मुझे पालने वाला व्यक्ति मुझे पिंजरे से हमेशा बाहर निकाल देता था। काश! मैं उड़ने में समर्थ होती और अपने साथी के पास पहुँच जाती। अपने साथी के पिंजरे से निकल भागने के बाद पिंजरे में मेरा अकेले रहना असंभव होता जा रहा है। लेकिन मुझे पालने वाला व्यक्ति हर समय यह दिलासा देता रहा कि टीना मायूस मत हो तुम्हारा सिकंदर (साथी) एक दिन तुम्हारे पास वापस ज़रूर आएगा। अपने पालने वाले की इन बातों को सुनकर मुझे कुछ सुकून मिलता और मैं सोचती कि मेरा सिकंदर एक दिन वापस ज़रूर आएगा। मुझे पालने वाला व्यक्ति शुरू से ही मुझे बहुत प्यार करता था और मेरी बहुत देखभाल करता था। अब वो सिकंदर के जाने के बाद अपना सारा समय मेरे साथ गुज़ारता है ताकि मैं अकेलापन महसूस ना करूँ। वो सिकंदर को भी मेरी तरह बहुत प्यार करता था इसलिए वो भी सिकंदर के चले जाने के बाद बहुत दुखी है और मैंने सिकंदर की याद में उसको रोते हुए भी देखा है।








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एक राजा और तोते की कहानी।

मौलाना जलालुद्दीन रूमी एक बहुत बड़े सूफ़ी संत थे। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन द्वारा इनकी 800 वीं जयँती पर 6 सितंबर 2007 से 14 सितंबर 2007 तक इनका जन्मदिन मनाया।  मौलाना रूमी ने अध्यात्म पर एक क़िताब लिखी जिसका नाम 'मसनवी रूमी' है। इस पुस्तक में उन्होंने कहानियों की जरिये अध्यात्म की प्राप्ति का रास्ता बताया। इन्हीं कहानियों में एक कहानी एक बादशाह से संबंधित है जिसने एक तोता पाल रखा था जिससे वो बहुत प्यार करता था। राजकाज का काम समाप्त करने के बाद वो रोज़ाना अपने तोते के पास आता और उससे विभिन्न प्रकार की बातें करता। बादशाह तोते से बात करके ख़ुश होता और उसे सुकून भी हासिल होता था। बादशाह जब बाहर कहीं जाता तो वापस आने के बाद सबसे पहले अपने तोते के पास आता और अपनी अनुपस्थिति के दौरान महल में होने वाली घटनाओं की जानकारी उससे लेता। एक बार जब वो राज्य से बाहर जाने लगा तो उसे अपने तोते से कहा की मैं जब भी बाहर जाता हूँ महल के लोगों की इच्छानुसार तोहफ़े लाता हूँ। इस बार बाहर जाने वक़्त मुझे ख़्याल आया कि तुम्हारे लिए भी कोई तोहफ़ा तुम्हारी इच्छानुसार ले आऊँ। बताओ तुम्हारे लिए क्या लेकर आऊँ? तोते ने ज़वाब में कहा कि जब आप अपने सफ़र के दौरान किसी बाग़ के पास से गुज़रें जहाँ पेड़ों पर तोते मौज़ूद हों तो आप उनसे मेरा ये संदेश कह दें 'ऐ तोतों, तुम यहाँ आज़ादी के साथ रह रहे हो और मौज़-मस्ती का जीवन गुज़ार रहे हो। मैं बादशाह के यहाँ एक पिंजरे में क़ैद हूँ और क़ैदी की दुःखभरी ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ। मुझे बताओ कि मैं अपने पिंजरे से कैसे आज़ाद होऊँ।' तभी एक तोता पेड़ से बादशाह के पैर के पास आकर गिरा। ये देखकर बादशाह घबरा गया क्योंकि उसने समझा कि तोता मर गया है। इस बात पर उसको बहुत अफ़सोस हुआ कि उसने अपने तोते का संदेश इस बाग़ के तोतों को पहुँचाकर ठीक नहीं किया क्योंकि इसकी वजह से एक तोता मर गया। बादशाह वहाँ से अपने सफ़र पर आगे निकल गया। जब वो सफ़र के बाद अपने महल पहुँचा तो सबसे पहले तोते के पास गया। उसने अपनी अनुपस्थिति के दौरान महल में होने वाली घटनाओं की जानकारी ली। इसके बाद तोते ने बादशाह से अपना संदेश तोतों को पहुँचाने के बारे में पूछा तो बादशाह ने कहा कि उसने तोते का पैग़ाम एक बाग़ के तोतों को पहुँचा दिया था। उसके संदेश को सुनकर बाग़ के तोतों में से एक तोता उसके पैर के पास आकर गिर पड़ा। उसे मरा हुआ समझकर मुझे बहुत अफ़सोस हुआ और मैं वहाँ से अपने सफ़र पर आगे निकल गया। बादशाह की बात सुनकर पिंजरे में क़ैद बादशाह का तोता पिंजरे में गिर पड़ा। बादशाह यह देखकर घबरा गया कि अब उसके तोते को क्या हो गया? उसने पिंजरा खोलकर जल्दी से तोते को बाहर निकाला और फ़र्श पर रख दिया। इसी बीच तोता फ़र्श से उड़ गया और महल के बाहर जाने लगा। तब बादशाह ने तोते से कहा कि यह क्या माज़रा है? तोते ने ज़वाब दिया कि मैंने अपनी क़ैद से आज़ादी पाने के लिए तोतों को संदेश भिजवाया था। उस संदेश के ज़वाब में जो तोता आपके पैर के पास आकर गिरा था और जिसे आपने मरा हुआ समझ लिया था उसने मुझे संदेश दिया कि मैं भी मरने का नाटक करूँ। जिसकी वजह से मैं पिंजरे से बाहर निकाल दिया जाऊँगा। तभी यह मौका होगा कि मैं उड़कर महल से बाहर चला जाऊँ। अपने तोते की बात सुनकर बादशाह ने उससे कहा कि तुम्हे आज़ाद होना था तो मुझसे कह देते मैं तुम्हे आज़ाद कर देता। तब तोते ने कहा कि बादशाह सलामत आप मुझे आज़ाद नहीं करते क्योंकि आप मुझसे बहुत प्यार करते हैं। इसीलिए मैंने तोतों के पास संदेश भिजवाया था कि मैं कैसे आज़ाद हो जाऊँ और उनके संदेश को पाकर मैंने ये कोशिश की और क़ामयाब हुआ। इस कहानी से मालूम होता है कि कोई तोता पिंजरे में कैद की ज़िंदगी नहीं गुज़ारना चाहता है। चाहे वह पिंजरे में कितने दिन भी रहे और उसे पालने वाला उसको कितना भी प्यार दे।
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- रोहित शर्मा विश्वकर्मा


Friday, May 29, 2020

This is the story of 'Mahabharat'. It is the story of Cowardice, Dishonesty and Treachery.

With begging pardon from those who believe in Mahabharat as a religious story and understand that all details is stated in Mahabharat are cent percent true, so there is no place for criticizing it because in this great war Lord Krishna himself took part as a Saarthi of Arjuna, so it is very clear from this fact that Lord Krishna fully supported Pandavas and their army. I am writing this article after having watched the Mahabharat serial telecasted during lockdown period on Doordarshan (Bharti) concluded a few days ago. I had watched the Mahabharat serial earlier too when I was a child. Then I had enjoyed of watching the Mahabharat and had reached at the conclusion that Pandavas were right to fight Kauravas for taking back their states from the possession of Kauravas. I also thought the way of winning the battle by Pandavas was right. After passing 30 years when this serial was again telecasted, I took again interest for waching it. But this time I watched this serial as a mature minded person, so I found a number of wrong things in the story of Mahabharat. Since I am a Journalist, so my conscious compells me to throw light on the wrong things of the Mahabharat felt by me. I am not bringing these unethical and blameworthy things of Mahabharat into light not with a bad intention, but as a narrator who wants to tell the people what he watches, listen and reads. Although I know that this article of mine based on unethical and blameworthy things of Mahabharat will cause anger in many people but I am compelled to through light on these unethical and blameworthy things of Mahabharat because of my responsibility as a Journalist to tell the people what is right and what is wrong?

In my views, the battle of Mahabharat could be prevented for happening it and could be saved lacs of lives of soldiers of both sides who were killed during the 18 days of Mahabharat battle, if honest attempt of preventing it could be made by the both sides. All we know that the Mahabharat battle took place because of the date of ending of Agyaatvaas (self concealment) of Pandavas from the eyes of rivals. Infact Duryodhan wanted to search out the Pandavas during the period of Agyaatvaas, so he had ordered his chief of detectives for finding out the Pandavas. The Detectives succeeded in searching out of Pandavas during the period of their Agyaatvaas. They all had taken shelter in the Raj Bhavan of King Matsya as his servants. Duryodhan hatched a conspiracy for bringing Pandavas out from Raj Bhavan of King of Matsya. Under this conspiracy Duryodhan succeeded in pursuing Bhishma Pitamah for launching an attack on Kingdom of Matsya under the command of Bhishma Pitamah as a chief head of army of Kauravas. An attack was launched, Arjuna came out from the Raj Mahal for fighting this battle from the side of kingdom of Matsya. When he blew his shell as a sign of beginning the battle, Duryodhan recognised him at once and Bhishma Pitamah said it was Arjuna and since he was recognised during the period of Agyaatvaas, So we should return back to Hastinapur but Bhishma Pitamah did not agree to do so.

However the battle was fought and Arjuna alone defeated all the Hastinapur army by using an arrow which produce substance making people unconscious resulting in all soldiers and warriors of this army Bhishma Pitamah, Dronacharya, Kripacharya, Karna, Duryodhan, Ashwatthama, etc. became unconscious. Thus in this way Virat battle ended. Since Duryodhan succeeded in his plan to recognize Pandavas during the period of Agyaatvaas by launching a battle against Kingdom of Matsya, so he raised the matter of Agyaatvaas which had been disrupted on the day of Virat battle. The period of Agyaatvaas was still remain, so Pandavas must went for Vanvaas for period of 12 years and Agyaatvaas for 1 year. On the other hand Pandavas claimed that period of Agyaatvaas had ended one day earlier of Virat battle, so it is their right to get return back their state of Indraprastha. In this way the date of ending of the of the period of Agyaatvaas became a controversial issue as Dhritrashtra, the king of Hastinapur and the father of Duryodhan also said that issue of Agyaatvaas had become controversial because opinions of experts on this issue were different. This controversy was not resolved as both sides were adamant on their points of views. This is occassion, when honest attempts for preventing battle of Mahabharat should be made by resolving the controversy about the date of ending of the period of Agyaatvaas. In my view, if this controversy could had been resolved, the battle of Mahabharat could had not taken praised. It is a matter of surprised that Lord Krishna also did not take interest in resolving this controversy. It means that Lord Krishna was also of this view that period of Agyaatvaas had come to end one day before Virat battle. As far as the controversy relating to the period of Agyaatvaas is concerned, the statement of Duryodhan about not ending of the period of Agyaatvaas on the day of Virat battle seems correct. The reason is that Duryodhan wanted to bring an end of the period of Agyaatvaas before actual end of Agyaatvaas from the very beginning, so that Pandavas could be recognized before end of the period of Agyaatvaas and they could be compelled for going to Vanvaas and Agyaatvaas again. In this situation, he would have perfect knowledge about the date of beginning and date of ending.

The question arises, where did the seed of battle of Mahabharat was sown. All we know that when Hastinapur was divided into two parts for handing over one part to Pandavas. Pandavas gave name of their part of land Indraprastha. They got constructed a beautiful palace in Indraprastha and invited Duryodhan and his party for watching the new constructed palace. When Duryodhan and his party came there and Duryodhan entered the room considering the floor of the room was made of concrete but floor was not actually made of concrete. In fact, it was a masterpiece of construction which based one who entered the room because the floor was not floor but a tank in actual, so when Duryodhan entered the room, he fell in the tank. On this occasion Draupadi, the wife of five Pandavas was taunted by saying it that 'a child of a blind person is to be blind'. This taunt made by Draupadi made him extremely angry and it is understood that the taunt made against Duryodhan by Draupadi was the real cause of the battle of Mahabharat. For taking revenge from Draupadi Duryodhan planned a play of Chaucer with Pandavas. In this play of Chaucer, Pandavas got defeated by Duryodhan who not only won all their properties but also their wife Draupadi. Then Duryodhan ordered his younger brother Dushashan for bringing Draupadi in Rajya Sabha and consequently to disrobe her. All these unethical behaviours with Draupadi were meted out by Duryodhan for taking revenge from Draupadi for calling him 'a child of blind person is to be blind'. Here it will be a necessary to remind the readers about all details of results holding the play of Chaucer by 2 times. All these above incidents inched towards beginning of battle of Mahabharat, Although an attempt was made by Pandavas for preventing the battle of Mahabharat. But this attempt was made under the consideration that they had successfully completed the period of Agyaatvaas and so they had right to be returned  Indraprastha by Dhritrashtra, the King of Hastinapur. In my view Pandavas were on the wrong side for asking Indraprastha to be return by Dhritrashtra because the controversy about ending and not ending about of the period of Agyaatvsas. In this situation no unprejudice person accept the demand of Pandavas to be returned Indraprastha, so there attempt for preventing battle failed because Duryodhan flatly denied the demand of Pandavas to be return them Indraprastha, when an emissary of Pandavas came in Rajya Sabha and presented their demand of Indraprastha to be returned them but he was returned back with negative reply from Hastinapur. Then Lord Krishna decided himself to go to Hastinapur for presenting the old claim of Pandavas with their consent knowing it that his peace proposal will not be accepted by the Dhritrashtra and Duryodhan. Instead of it, Lord Krishna went in the Rajya Sabha of Hastinapur. The result was same as presumed by Lord Krishna. On this occasion Duryodhan rejecting his all proposals decidedly said he could not give Pandavas land even equal to tip of needle. In this connection the reply of Duryodhan maintained earlier statements that Pandavas must go again for Vanvaas and Agyaatvaas as they had been recognised before end of period of Agyaatvaas. The question arises did it was proper for Lord Krishna to go to Hastinapur for presenting the claim of Pandavas to be returned them Indraprastha? In the above situation I appeal to the readers that they should find out the answer of this question?

However this Battle of Mahabharat began in the name of religious battle against the unreligious acts of Hastinapur Kingdom. Today it seems strange about knowing it that a property dispute between two families how can be turned into a battle of religious acts and unreligious acts. Did Battle of Mahabharat was religious battle against and religious elements because in the Rajya Sabha of Hastinapur attempt of disrobing of Draupadi was made and demand of returning Indraprastha to Pandavas was denied by Duryodhan? Infact attempt of disrobing Draupadi in the Rajya Sabha of Hastinapur was a very-very serious, criminal, immoral and anti-religious act. Attempt of disrobing Draupadi was a barbaric attack on the dignity, honour, respect and tenderness of women and it was unpardonable. In fact it were Pandavas especially Yudhishthir whoever responsible for degrading dignity, respect, honour and tenderness of women by staking Draupadi in the play of Chaucer, so if anyone blame Duryodhan and this party for degrading the position of women we must first arrange punishment for Yudhishthir and then after for Duryodhan and his party.

The battle of Mahabharat is known as a battle of religious against the unreligious elements. It was told again and again during the battle period by Lord Krishna and in this context speech of Lord Krishna in the very beginning getting Arjuna understood for beginning the battle as Arjuna had denied to fight with the Kaurava's army consisting of people whoever is dears one as Bhishma Pitamah, Dronacharya, Kripacharya, Ashwatthama, Karna, Duryodhan etc. were included. Lord Krishna told Arjuna that he was fighting a Dharmyuddh (Religious Battle) against unreligious elements and whoever fighting this battle with the unreligious elements were not your near and dear relatives, but your enemies. So, you must fight against them when this battle began and when it ended, we saw a number of warriors of Kaurava's army were killed by Pandavas by adopting unethical way who could not be killed by Pandavas following the rules of battle set out in the very beginning by Bhishma Pitamah. In other sense all warriors of Kaurava's army killed by Pandavas by adopting method of cheating, treachery and dishonesty on the instigation of Lord Krishna. Pandavas could not win the battle of Mahabharat. When the battle began Bhishma Pitamah was appointed as army chief of Kaurava's army while Duryodhan knew it Bhishma Pitamah was loyal to Pandavas. Instead of it, Bhishma Pitamah was appointed as a chief of his army. Here this fact must be remembered that Bhishma Pitamah was granted a boon of 'Ichcha Mrityu' (he will die when he wishes). It means he will never be killed by anyone. In the battle of Mahabharat, Pandavas were not able to go ahead even and inch towards victory after battle of many days. Then Yudhisthir was sent to Bhishma Pitamah in the night and requested him to return back the blessing 'be victorious' as he could not win this battle as long as he would fight this as a chief of Kaurava's army. At this point Bhishma Pitamah revealed the secret of being removed him from the battlefield. He told Yudhishthir to bring an woman in front of him during the period of battle. Since he could not use arms against any woman and this was the occasion for Arjuna to hit me with his arrows. Next morning when battle began Arjuna came on his chariot with Shikhandi (An Eunuch). When Bhishma Pitamah and Arjuna were attacking by using arrows, only then Shikandi was brought before Arjuna in front of Bhishma Pitamah. Having seen Shikhandi in front of him instead of Arjuna, Bhishma Pitamah kept his bow and arrow on the chariot because he could not use them against Shikhandi who belong to be third gender. To attack on armless person during battle field as a violation of battle rules, Arjuna hesitated to attack on armless Bhishma Pitamah. Here Lord Krishna instigated Arjuna for attacking on Bhishma Pitamah, preaching him that Bhishma Pitamah was an enemy not his relative. On being provoked by Lord Krishna, he attacked on Bhishma Pitamah with using a number of arrows which turned into bed of arrows for Bhishma Pitamah. Now Bhishma Pitamah could not take part in the battle but he would live as long as he wished. Thus Bhishma Pitamah was removed from the battlefield on being used Shikandi as a female person. After removing from the battlefield, Pandavas had to face Dronacharya as a army chief of Kauravas. He (Dronacharya) also proved as a big obstruction by Pandavas for winning the battle. Then Lord Krishna adviced Pandavas to kill the elephant named Ashwatthama taking part in the battle and got this rumour spreaded that Ashwatthama was killed in the battle. Having hearing this rumour, Dronacharya army chief of Kauravas was shocked because he understood that his son Ashwatthama was killed in the battle. So, he came to Yudhishthir for verification of death of his son Ashwatthama, but Yudhishthir first wanted to tell the truth about the death of Ashwatthama. But Lord Krishna adviced him not to tell the truth having seen Yudhishthir to be inclined to tell truth, Lord Krishna adviced him to confirm the rumour of death of Ashwatthama in reply of Dronacharya's enquiry. In fact Dronacharya had come to Yudhishthir for confirmation of his son thinking it that Yudhishthir would tell the truth as he was called 'Dharmraj Yudhishthir'. On being confirmed about the rumour relating the death of Ashwatthama by Yudhishthir, Dronacharya kept his bow and arrow on the chariot and came down from it and sat on the earth in posture of meditation. At that time Arjuna had stopped his attack on Dronacharya as Dronacharya has become armless, but Lord Krishna reminded him of fighting Dharmyuddh in which violation of rules of battle was not important but the important thing was to kill the enemy, if he was armless too. Listening this preach from Lord Krishna, Arjuna came down from the chariot holding a sword in his hand and chopped of neck of Dronacharya. Is this act of Arjuna not a cowardly act and an act of defeat? When Dronacharya achieved heroic end in the battle, Karna was appointed army chief of Kauravas. He took the command of Kaurava's army and he fought the battle of the day left by Dronacharya. In the evening when battle was inching towards the end, Karna got an opportunity to kill Arjuna at that time of sunset, but he did not kill Arjuna as it would be violation of rules of the battle. Next day under the command of Karna, Kaurava's army fell on Pandava's army and a fierce battle started between Kauravas and Pandavas. Karna and Arjuna were attacking on each other with their arrows. The time was passing and Karna & Arjuna engaged in fierce battle attacking on each other. Meanwhile a wheel of chariot of Karna sank to the earth, so he was unable to fight with Arjuna. In this situation Karna told Arjuna that his chariot's wheel sank to the earth and he was going down from his chariot for pulling out the sanked wheel to the earth. Arjuna stop his attack on Karna, then Lord Krishna provoked him for killing Karna who was armless saying it that it was Karna who had called Draupadi a Vaishya (Whore). Here it should be remembered that when Lord Krishna had gone to see Karna before beginning of the battle of Mahabharat and had proposed him to support Pandavas in the battle being their brother. Karna had rejected this proposal and had told him that he could not go to the camp of Pandavas because Draupadi was there and he could not face her as he had disrespected her in the Rajya Sabha of Hastinapur for which he had been feeling with repenting for it even today. Arjuna become furiouted and he killed armless Karna.

Jayadratha, the king of Sindhu Kingdom was also killed by Arjuna by adopting unethical means. On being killed Abhimanyu in absence of Arjuna from the battlefield. Arjuna was told that Jayadratha had stopped Pandava's army, so that no help could be reached to Abhimanyu and thus Abhimanyu was killed fighting with all warriors of Kaurava's army. Among them Dronacharya, Karna, Duryodhana, Ashwatthama, Shakuni etc. were included. Then Arjuna took oath that tomorrow Jayadratha could not see sunset and if tomorrow Jayadratha could not be killed by me till the sunset time, he would immolate himself sitting on fire. Next morning when battle started Arjuna tried his best to kill Jayadratha all the day but he did not succeeded in his attempt and sun began to set. At that time Lord Krishna got sunset by showing his miracle. Then Jayadratha and other warriors of Kaurava's army became happy and demanded that now Arjuna must immolate himself sitting on fire as he could not kill Jayadratha till sunset time. After sometime the sun rose again and Jayadratha was killed by Arjuna.

In the last Duryodhan took on Bhimsen in Mace duel. The best warrior of Mace duel Bhimsen could not defeat Duryodhan in the battle of Mace fought for a long time. On noticing inability of Bhimsen to defeat Duryodhan, Lord Krishna indicating Bhimsen to hit the thigh of Duryodhan with the Mace. In Mace duel it was prohibited to hit on thigh of a rival. But Bhimsen known as a best warrior of Mace duel hit on the thigh of Duryodhan which caused his death.

Thus we see that the battle of Mahabharat could not be won by Pandavas, if they would fight this battle according to the rules of battle. They killed all warriors of Kaurava's army by violating the battle rules on instigation of Lord Krishna who had turned the property dispute of two families into Dharmyuddh and got Pandavas victory by Adharm way. Those viewers of Mahabharat serial who are not Hindu will criticize the roles of Pandavas along with Lord Krishna for fighting of the battle of Mahabharat by adopting unethical, improper and immoral. In this battle the role of Lord Krishna is very high objectionable.


- Rohit Sharma Vishwakarma

Tuesday, May 26, 2020

यह महाभारत की कहानी है। यह कायरता, बेईमानी और छलकपट की कहानी है।

मैं उन लोगों से क्षमा याचना चाहता हूँ। जो लोग महाभारत की कहानी को एक धार्मिक कहानी मानते हैं और वें यह समझते हैं कि इस कहानी में वर्णित सारा विवरण शत-प्रतिशत सही है। इसलिए इसकी आलोचना का कोई सवाल नहीं उठता क्योंकि इस महान युद्ध में भगवान कृष्ण ने अर्जुन का सारथी बनकर हिस्सा लिया। इसलिए इस तथ्य से यह बहुत स्पष्ट है कि भगवान कृष्ण ने इस युद्ध में पाण्डवों और उनकी सेना का पूरी तरह समर्थन किया। मैं यह लेख दूरदर्शन (भारती) पर लॉकडाउन के दौरान प्रसारित और अभी हाल में इसके ख़त्म होने के बाद लिख रहा हूँ। मैंने महाभारत सीरियल पहले भी देखा था जब मैं बच्चा था। तब मैंने महाभारत सीरियल देखने का आनंद लिया था और इस नतीजे पर पहुँचा था कि पाण्डवों द्वारा अपने राज्य को प्राप्त करने के लिए कौरवों से जो युद्ध किया था वो सही था। मेरा यह भी विचार था कि पाण्डवों ने इस युद्ध को लड़ने के लिए जो तरीका अपनाया था वो भी सही था। 30 साल बाद जब महाभारत सीरियल पुनः प्रसारित किया जाने लगा तब मैंने इसे देखने में फिर दिलचस्पी ली। इस बार मैंने महाभारत सीरियल को एक परिपक्व सोच वाले दर्शक के रूप में देखा और मैंने महाभारत की कहानी में बहुत सी गलत बातें पाईं। क्योंकि मैं एक पत्रकार हूँ इसलिए मेरी अंतरात्मा मुझे विवश करती है कि मैं महाभारत में पाई जाने वाली गलत बातों पर प्रकाश डालूँ। मैं महाभारत में पाई जाने वाली अनैतिक और निंदनीय बातों पर किसी बुरे इरादे से प्रकाश नहीं डाल रहा हूँ। मैं इनको एक कथाकार के तौर पर पेश कर रहा हूँ जो जो देखता है, पढ़ता है और सुनता है। यद्यपि मैं यह जानता हूँ कि मेरे द्वारा महाभारत में पाई जाने वाली अनैतिक और निंदनीय बातों के प्रस्तुत करने पर लोग क्रोध से भड़क उठेंगे। लेकिन मैं महाभारत में पाई जाने वाली गलत बातों को प्रस्तुत करने में विवश हूँ, क्योंकि पत्रकार होने के नाते मेरी यह ज़िम्मेदारी है कि लोगों को बताऊँ कि क्या सच है और क्या गलत है? 

मेरा यह विचार है कि महाभारत युद्ध को रोका जा सकता था और 18 दिनों तक लड़े गये इस युद्ध में दोनों पक्षों के मारे गए लाखों सैनिकों का जीवन बचाया जा सकता था। अगर दोनों पक्षों द्वारा इसे रोकने के लिए ईमानदारी से प्रयास किया गया होता तो इसे रोका जा सकता था। हम सभी जानते हैं कि महाभारत युद्ध की शुरुआत पाण्डवों के अज्ञातवास की अवधि के समाप्त होने से पहले उनकी पहचान हो जाने के कारण हुई थी। वास्तव में दुर्योधन चाहता था कि पाण्डवों को उनके अज्ञातवास समाप्त होने से पहले खोज लिया जाए। इसलिए उसने अपने गुप्तचरों के मुखिया को आदेश दिया कि पाण्डवों को खोज निकाला जाए। दुर्योधन के गुप्तचर अंततः पाण्डवों को उनके अज्ञातवास के दौरान खोज निकालने में सफल रहे। सभी पाण्डवों ने राजा मत्स्य के महल में उनके सेवकों के रूप में शरण ले रखी थी। दुर्योधन ने पाण्डवों को राजा मत्स्य के महल से बाहर निकालने की साजिश रची। इस साजिश के तहत दुर्योधन ने मत्स्य राज पर हमला करने के लिए भीष्म पितामह को तैयार कर लिया ताकि यह युद्ध कौरव सेना उनकी अगुवाई में लड़े। इस प्रकार मत्स्य राज्य पर हमला बोल दिया गया। तब अर्जुन मत्स्य राज्य की ओर से मुकाबला करने के लिए युद्ध के मैदान में आए और जब अर्जुन ने युद्ध शुरू करने का संकेत अपना शंख बजाकर दिया तो दुर्योधन ने शंख की आवाज़ सुनकर अर्जुन को तुरंत पहचान लिया और भीष्म पितामह से कहा कि अब हम हस्तिनापुर लौट चलें क्योंकि अर्जुन को अज्ञातवास की अवधि ख़त्म होने से पहले पहचान लिया गया है लेकिन भीष्म पितामह ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। 

बहरहाल युद्ध लड़ा गया और अर्जुन ने अकेले ही कौरव सेना के योद्धाओं को पराजित कर दिया। अर्जुन ने ऐसा करने के लिए ऐसे बाण का इस्तेमाल किया जिससे बेहोश कर देने वाला धुआँ उत्पन्न हुआ, जिसके कारण कौरव सेना और उनके योद्धा भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, अश्वथामा सभी बेहोश हो गए और इस प्रकार विराट युद्ध का समापन हुआ। दुर्योधन पाण्डवों को मत्स्य राज्य के महल से निकालने की अपनी योजना में सफ़ल हो गया। इसलिए उसने विराट युद्ध के दिन अज्ञातवास के भंग होने का मुद्दा उठाया क्योंकि उस दिन पाण्डवों की अज्ञातवास की अवधि समाप्त होने और ना होने के विवाद के समाधान के लिए ईमानदारी से अज्ञातवास की अवधि समाप्त नहीं हुई थी। ऐसी स्थिति में दुर्योधन का कहना था कि पाण्डव दोबारा 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास को पूरा करें। दूसरी तरफ पाण्डवों का यह दावा था कि विराट युद्ध के 1 दिन पहले उनके अज्ञातवास की अवधि पूरी हो गई थी। इसलिए वे अपने राज्य इंद्रप्रस्थ को पाने के हक़दार थे। इस तरह अज्ञातवास की अवधि विवाद में बदल गई क्योंकि हस्तिनापुर के राजा और दुर्योधन के पिता धृतराष्ट्र ने भी इस मुद्दे पर यह राय व्यक्त की कि अज्ञातवास की अवधि का मुद्दा विवादित हो गया है क्योंकि विशेषज्ञों की राय विभिन्न है। अज्ञातवास संबंधित विवाद का हल इसलिए नहीं निकल पाया क्योंकि दोनों पक्ष अपने-अपने विचार पर अड़े हुए थे। यह वह अवसर था जब महाभारत के युद्ध को रोकने के लिये प्रयास किया जाना चाहिए था। मेरे विचार से अगर इस विवाद का समाधान हो जाता तो महाभारत का युद्ध रोका जा सकता था। यह आश्चर्य की बात है कि भगवान कृष्ण ने भी इस विवाद को हल करने में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं ली। इसका मतलब है कि भगवान कृष्ण भी यह मान रहे थे कि अज्ञातवास की अवधि विराट युद्ध से पहले समाप्त हो गई थी। जहाँ तक अज्ञातवास से संबंधित विवाद का संबंध है इस सिलसिले में दुर्योधन का यह कहना सही लगता है कि विराट युद्ध के दिन अज्ञातवास की अवधि समाप्त नहीं हुई थी। इसका कारण यह है कि दुर्योधन अज्ञातवास की अवधि के समाप्त होने से पहले पाण्डवों को पहचान लिए जाने वाले प्रयास बिल्कुल शुरू से ही कर रहा था ताकि पाण्डवों को अज्ञातवास की अवधि के पूरे होने से पहले पहचान लिया जाए और उन्हें दोबारा वनवास और अज्ञातवास पर जाने के लिए विवश किया जा सके। ऐसी स्थिति में अज्ञातवास के ख़त्म होने के दिन के बारे में उसकी जानकारी सही थी। 

सवाल उठता है कि महाभारत के युद्ध का बीज कहाँ बोया गया था? हम सब जानते हैं कि हस्तिनापुर राज्य को दो हिस्सों में बाँटा गया ताकि एक हिस्सा पाण्डवों को हस्तांतरित कर दिया जाए। पाण्डवों ने अपने राज्य का नाम इंद्रप्रस्थ रखा। उन्होंने इंद्रप्रस्थ में अपने लिए एक अति सुंदर महल बनवाया और दुर्योधन और उसके दल को महल के अवलोकन के लिए आमंत्रित किया। जब दुर्योधन और उसका दल महल देखने के लिए पहुँचे तो एक कमरे में जब दुर्योधन उसके फर्श को यह समझकर दाखिल हुआ कि कमरे का फर्श ठोस सामग्री से बना हुआ है तो वह पानी में गिर पड़ा क्योंकि कमरे का फर्श देखने में ठोस लगता था लेकिन वास्तव में एक तालाब था। इस अवसर पर द्रौपदी ने दुर्योधन पर यह तंज किया कि अँधे का पुत्र अँधा ही होता है। यह सुनकर दुर्योधन तिलमिला उठा। सवाल उठता है कि क्या द्रौपदी द्वारा दुर्योधन पर तंज किया जाना ही महाभारत युद्ध का असल कारण था। द्रौपदी से अपने अपमान का बदला लेने के लिए दुर्योधन ने पाण्डवों के साथ 'चौसर' खेलने की योजना बनाई। 'चौसर' के इस खेल में दुर्योधन ने पाण्डवों को हरा दिया, जिसमें उसने पाण्डवों की ना सिर्फ सभी संपत्ति जीत ली बल्कि उनकी पत्नी द्रौपदी को भी जीत लिया। तब दुर्योधन ने अपने छोटे भाई को निर्देश दिया कि वह द्रौपदी को घसीट कर राज्यसभा में ले आए और उसके बाद उसका वस्त्र-हरण किया जाए। द्रौपदी के साथ सभी अनैतिक व्यवहार दुर्योधन द्वारा किए गए। दुर्योधन द्वारा द्रौपदी के साथ अनैतिक व्यवहार इस कथन के लिए किया गया कि अँधे का बेटा अँधा ही होता है। यहाँ पाठकों को 'चौसर' के खेल में पाण्डवों द्वारा अपनी पत्नी समेत सभी संपत्ति को हारने से संबंधित विवरण को याद दिलाना आवश्यक होगा। उपरोक्त सभी घटनाएँ महाभारत युद्ध के शुरू होने का कारण बनी। यद्यपि बाद में पाण्डवों द्वारा महाभारत युद्ध को रोकने की कोशिश की गई, लेकिन यह कोशिश इस विचार के तहत की गई कि उन्होंने अज्ञातवास की अवधि को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। इसलिए उनका यह अधिकार है कि हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र द्वारा उनका राज्य इंद्रप्रस्थ उन्हें लौटा दिया जाए। मेरे विचार से पाण्डवों द्वारा अपने राज्य इंद्रप्रस्थ वापसी की माँग गलत थी क्योंकि अज्ञातवास की अवधि के ख़त्म होने या ना होने से संबंधित विवाद बरक़रार था। इन परिस्थितियों में पाण्डवों द्वारा अपने राज्य इंद्रप्रस्थ की वापसी की मांग को कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति उचित नहीं ठहराएगा। इसलिए उनका (पाण्डवों का) युद्ध को रोकने का प्रयास असफल हुआ क्योंकि दुर्योधन ने साफ़ तौर पर पाण्डवों को उनका राज्य वापस देने से इनकार कर दिया था। जब पाण्डवों ने अपना दूत हस्तिनापुर भेजा जिसमें पाण्डवों को उनका राज्य इंद्रप्रस्थ वापस किए जाने का प्रस्ताव था। तब भगवान कृष्ण पाण्डवों की रजा़मंदी से स्वयं हस्तिनापुर शाँति प्रस्ताव लेकर गए, यह जानते हुए भी कि धृतराष्ट्र और दुर्योधन उनके शाँति प्रस्ताव को नहीं मानेंगे। नतीजा वही निकला जिसका भगवान कृष्ण को अंदाजा़ था। इस अवसर पर दुर्योधन ने निर्णायक तौर पर यह कह दिया कि पाण्डवों को वह सूईं की नोंक के बराबर भी ज़मीन नहीं देगा। इस संबंध में दुर्योधन ने अपना पूर्वत बयान दोहराया कि पाण्डवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास पुनः पूरा करना होगा क्योंकि वें लोग अज्ञातवास की अवधि पूरी होने से पहले ही पहचान लिए गए। सवाल उठता है कि क्या भगवान कृष्ण का हस्तिनापुर के राज्यसभा में जाकर पाण्डवों की इस मांग को कि उनका राज्य इंद्रप्रस्थ उन्हें वापस कर दिया जाए? उपरोक्त परिस्थितियों में मैं पाठकों से यह अपील करता हूँ कि वें इस प्रश्न का उत्तर बताएं। 

बहरहाल महाभारत का युद्ध धर्म और अधर्म के बीच युद्ध के नाम से शुरू हुआ। आज यह आश्चर्यजनक लगता है कि दो परिवारों के बीच का भूमि विवाद कैसे धर्म और अधर्म के बीच का युद्ध बन गया। क्या महाभारत का युद्ध धर्म और अधर्म के बीच का युद्ध था क्योंकि हस्तिनापुर की राज्यसभा में द्रौपदी के वस्त्र-हरण का प्रयास किया गया था और दुर्योधन द्वारा पाण्डवों की इंद्रप्रस्थ लौटाए जाने की मांग को ठुकरा दिया गया था। वास्तव में हस्तिनापुर की राज्यसभा में द्रौपदी के वस्त्र-हरण की कोशिश एक बहुत ही गंभीर, आपराधिक, अनैतिक और अधर्म कृत्य था। द्रौपदी के वस्त्र-हरण का प्रयास औरत के सम्मान, गरिमा, आदर और सतीत्व पर हमला था और यह अक्षम्य कृत्य था। वास्तव में वों पाण्डव थे विशेषकर धर्मराज युधिष्ठिर जिन्होंने द्रौपदी को 'चौसर' के खेल में दाँव पर लगाकर उसके आदर, सम्मान, गरिमा और सतीत्व को ठेस पहुँचाने के लिए जिम्मेदार थे। इसलिए जो कोई दुर्योधन और उनके दल को औरत को अपमानित करने के लिए जि़म्मेदार ठहराता है उसे सबसे पहले युधिष्ठिर को सजा़ देने का प्रबंध करना चाहिए और फि़र दुर्योधन और उसके दल को। 

महाभारत का युद्ध धर्म और अधर्म के बीच के युद्ध के तौर पर जाना जाता है। इस बात को युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण द्वारा बार-बार कहा गया है और इसी संदर्भ में भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को युद्ध शुरु करने की बात समझाई क्योंकि अर्जुन ने कौरव सेना पर जिसमें द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह, अश्वथामा, दुर्योधन आदि शामिल थे, हमला करने से इंकार कर दिया था। उस वक्त भगवान कृष्ण ने यही कहा था कि वह (अर्जुन) एक धर्म युद्ध अधर्मी तत्वों के विरुद्ध लड़ रहा है और वह जिन अधर्मी तत्वों के खिलाफ़ युद्ध लड़ रहा है वें उसके सगे-संबंधी नहीं है बल्कि वें उसके दुश्मन हैं। इसलिए तुम्हें उनके खिलाफ़ युद्ध लड़ना ही है। इस युद्ध में शुरू से अंत तक हम देखते हैं कि पाण्डवों द्वारा कौरव सेना के योद्धाओं को गलत तरीके से मारा गया जिन्हें भीष्म पितामह द्वारा बताए गए युद्ध के नियमों का पालन करते हुए नहीं मार सकते थे। दूसरे शब्दों में कौरव सेना के योद्धाओं को पाण्डवों द्वारा भगवान कृष्ण के इशारे पर धोखा, बेईमानी और छल कपट के तरीके को अपनाकर मारा गया। अगर ऐसा ना किया गया होता तो पाण्डव महाभारत युद्ध को नहीं जीत सकते थे। युद्ध आरंभ होने पर भीष्म पितामह को कौरव सेना का प्रधान सेनापति बनाया गया। जबकि दुर्योधन यह जानता था कि भीष्म पितामह की निष्ठा पाण्डवों के साथ है। यहाँ इस बात को याद रखना चाहिए कि भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान मिला हुआ था। इसका अर्थ यह है कि किसी भी दुश्मन द्वारा उनको मारा नहीं जा सकता था। महाभारत युद्ध के कई दिन चलने के बाद भी पाण्डव जीत की ओर बढ़ने में असमर्थ थे। तब युधिष्ठिर को रात के समय भीष्म पितामह के पास भेजा गया जोकि युद्ध के नियमों के अनुसार था और भीष्म पितामह से अनुरोध किया कि वह अपना 'विजयी भवः' का आशीर्वाद वापस ले लें, जिसे उन्होंने उन्हें दिया था क्योंकि वें इस युद्ध को उस वक्त तक नहीं जीत सकते हैं। जब तक वह कौरव सेना के प्रधान सेनापति के तौर पर युद्ध लड़ेंगे। तब भीष्म पितामह ने युद्ध के मैदान से स्वयं को हटाने का उन्हें अपना रहस्य बताया। उन्होंने युधिष्ठिर को बताया कि युद्ध के दौरान एक औरत को उनके सामने ला दिया जाए क्योंकि वह किसी औरत के ख़िलाफ अपने हथियारों का प्रयोग नहीं कर सकते और यह वह अवसर होगा जब अर्जुन मुझ पर बाण का प्रयोग कर सकता है। अगली सुबह जब युद्ध शुरू हुआ तब अर्जुन युद्ध के मैदान में अपने रथ पर शिखंडी के साथ आया। युद्ध शुरू हुआ तब भीष्म पितामह और अर्जुन एक-दूसरे पर बाणों से प्रहार करने लगे तभी शिखंडी (जो एक हिजडा़ था) को अर्जुन के आगे और भीष्म पितामह के सामने कर दिया गया। अर्जुन के बजाय शिखंडी को अपने सामने देखकर भीष्म पितामह ने अपना धनुष-बाण रथ पर एक किनारे रख दिया क्योंकि वह अपना शस्त्र किसी औरत पर प्रयोग नहीं कर सकते थे। एक निहत्थे पर हथियार का प्रयोग युद्ध के नियमों के खिलाफ़ था इसलिए अर्जुन भीष्म पितामह पर बाण चलाने में हिचकिचा रहा था। तब भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा कि भीष्म पितामह तुम्हारे सगे-संबंधी नहीं है बल्कि तुम्हारे शत्रु है। भगवान कृष्ण द्वारा उकसाए जाने पर अर्जुन ने भीष्म पितामह पर बाणों की वर्षा कर दी जिसके नतीजे में यें बाण भीष्म पितामह के लिए शय्या बन गए। अब भीष्म पितामह युद्ध में भाग नहीं ले सकते थे, लेकिन वह अपनी इच्छा के मुताबिक जीवित रह सकते थे। इस प्रकार भीष्म पितामह को युद्ध के मैदान से हटा दिया गया। भीष्म पितामह को पाण्डवों द्वारा युद्ध के मैदान से हटाए जाने के बाद उन्हें द्रोणाचार्य का सामना करना पड़ा जो कौरव सेना के नए प्रधान सेनापति बनाए गए थे। वह भी पाण्डवों द्वारा युद्ध जीतने के लिए बहुत बड़ी रुकावट बने। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वथामा नामक हाथी को मारने का परामर्श पाण्डवों को दिया और अश्वथामा हाथी के मारे जाने की अफ़वाह युद्ध में फैला दी। यह अफ़वाह सुनकर कौरव सेना के प्रधान सेनापति द्रोणाचार्य को बड़ा सदमा लगा, क्योंकि उन्होंने समझा कि उनका पुत्र अश्वथामा युद्ध में मारा गया और वह युधिष्ठिर के पास अपने पुत्र अश्वथामा के मारे जाने की पुष्टि के लिए आए। युधिष्ठिर पहले अश्वथामा के मारे जाने की पुष्टि करने में हिचकिचा रहे थे। तब भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर का सच बताने की ओर रुझान देखकर उन्हें सच ना बताने का परामर्श दिया और कहा कि वह द्रोणाचार्य द्वारा अपने पुत्र के मारे जाने के प्रश्न की पुष्टि कर दे। वास्तव में द्रोणाचार्य युधिष्ठिर के पास अपने पुत्र के मारे जाने की सच्चाई जानने के लिए युधिष्ठिर के पास इसलिए आए थे क्योंकि युधिष्ठिर धर्मराज के तौर पर जाने जाते थे और द्रोणाचार्य को यह विश्वास था कि युधिष्ठिर सच बताएंगे। अपने पुत्र के मारे जाने की अफवाह को सच बताए जाने पर द्रोणाचार्य ने अपना धनुष-बाण अपने रथ पर रखा और रथ से उतरकर धरती पर आ गए और ध्यान की मुद्रा में बैठ गए। तब अर्जुन ने उन पर हमला करना बंद कर दिया और जब द्रौणाचार्य निहत्थे हो गये तो भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया कि वह एक धर्म युद्ध लड़ रहा है जिसमें युद्ध के नियमों का पालन करना महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि दुश्मन को मारना महत्वपूर्ण है। भगवान कृष्ण के इस उपदेश को सुनकर अर्जुन अपने हाथ में तलवार लेकर अपने रथ से नीचे उतरा और द्रोणाचार्य का सर धड़ से अलग कर दिया। सवाल उठता है कि क्या अर्जुन का यह कृत्य कायरता और धोखेबाजी का कृत्य नहीं था? जब द्रोणाचार्य युद्ध के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए तो कर्ण को कौरव सेना का प्रधान सेनापति बनाया गया और उसने उस दिन द्रोणाचार्य द्वारा छोड़े गए युद्ध को शुरू किया। जब शाम को युद्ध समाप्ति की ओर बढ़ रहा था तब कर्ण को अर्जुन को मारने का मौका मिला लेकिन कर्ण ने सूर्यास्त के समय दुश्मन पर हमला न करने के युद्ध के नियम का पालन किया और इस तरह अर्जुन को मारे बगैर छोड़ दिया। दूसरे दिन कर्ण की अगुवाई में कौरव सेना ने पाण्डव सेना पर हल्ला बोल दिया और फिर पाण्डवों और कौरव की सेनाओं के बीच भीषण युद्ध शुरू हो गया। कर्ण और अर्जुन भी एक-दूसरे पर अपने बाणों से हमला करने लगे। समय बीतता रहा और कर्ण और अर्जुन एक-दूसरे पर हमला करने में लगे रहे। इसी बीच कर्ण के रथ का एक पहिया धरती में धँस गया और कर्ण अर्जुन से युद्ध करने में असमर्थ हो गया। तब उसने अर्जुन को संबोधित करते हुए कहा कि उसके रथ का एक पहिया धरती में धँस गया है और वह रथ से उतरकर पहिये को धरती से निकालने जा रहा है और अर्जुन ने कर्ण पर हमला करना बंद कर दिया। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उकसाया कि यह वही कर्ण है जिसनेे द्रौपदी को वैश्या कहा था। यहाँ यह बात स्मरनीय है कि महाभारत युद्ध से पहले जब कर्ण और भगवान कृष्ण एक-दूसरे से मिले थे और भगवान कृष्ण ने कर्ण को पाण्डवों का साथ देने का प्रस्ताव उनका भाई होने के नाते रखा था। कर्ण ने कृष्ण के इस प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि पाण्डवों के शिविर में द्रौपदी भी मौजूद है जिसका सामना मैं नहीं कर सकता क्योंकि मैंने उसे हस्तिनापुर की राज्यसभा में अपमानित किया था जिसके लिए मैं अपराध बोध से ग्रस्त हूँ और मैं ऐसा करने के लिए मन से दुखी हूँ। अर्जुन क्रोधित हो उठा और उसने निहत्थे कर्ण को मार दिया।

इसी तरह सिंधु नरेश जयद्रथ को भी अर्जुन ने युद्ध के नियमों का उल्लंघन कर मार डाला। युद्ध के मैदान में अर्जुन की अनुपस्थिति में जब अभिमन्यु मारा गया तो अर्जुन को बताया गया कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जयद्रथ ने पाण्डवों की सारी सेना को रोक लिया और इस तरह शत्रुओं के बीच में अभिमन्यु अकेला पड़ गया। तब शत्रुओं ने अभिमन्यु को घेरकर मार डाला। अभिमन्यु का यह वध भी युद्ध के नियमों के ख़िलाफ था क्योंकि कौरव सेना के कई योद्धाओं ने मिलकर अभिमन्यु को मारा था। यह सुनकर अर्जुन ने प्रण किया कि जयद्रथ कल का सूर्यास्त नहीं देखेगा और अगर ऐसा नहीं हुआ तो वो स्वयं अग्नि समाधि ले लेगा। अगली सुबह जब युद्ध शुरू हुआ तो अर्जुन ने जयद्रथ को मारने का भरपूर प्रयास किया, लेकिन असफल रहा और शाम हो गई और सूर्यास्त होने लगा। इसी बीच भगवान कृष्ण ने चमत्कार कर सूर्यास्त करा दिया। यह देखकर कौरव सेना के योद्धा बहुत प्रसन्न हुए और अट्ठाहस करने लगे। उन्होंने अर्जुन से कहा कि अब वह अग्नि समाधि ले ले। अचानक भगवान कृष्ण के चमत्कार से सूर्य फिर उदय हुआ। उस वक्त जयद्रथ अर्जुन के बिल्कुल सामने था और तब अर्जुन ने जयद्रथ को मार गिराया। अंत में दुर्योधन ने सर्वश्रेष्ठ गदाधारी भीमसेन को गदायुद्ध के लिए ललकारा। दोनों गदायुद्ध करने लगे जो काफ़ी लंबा चला। जब भीमसेन दुर्योधन को मारने में असफ़ल रहा तब भगवान कृष्ण ने भीमसेन को इशारा कर दुर्योधन की जंघा पर हमला किया जो दुर्योधन की मौत का कारण बना।

इस प्रकार हम देखते हैं कि महाभारत का युद्ध पाण्डवों ने धोखा, छलकपट और बेईमानी का रास्ता अपनाकर कौरव के योद्धाओं को मारा और युद्ध जीता और इसी के साथ उन्होंने अपनी कायरता का प्रदर्शन किया। इस प्रकार पाण्डवों और कौरवों के बीच भूमि विवाद को धर्म और अधर्म के बीच का युद्ध बना दिया गया।

महाभारत सीरियल के गैर हिंदू दर्शक कौरव सेना के योद्धाओं को पाण्डवों द्वारा भगवान कृष्ण के उकसाने पर अनुचित, अनैतिक और अधर्म तरीका अपनाकर मारने की कार्रवाई की आलोचना किए बगैर नहीं रहेगा। ऐसी स्थिति में महाभारत युद्ध में भगवान कृष्ण की भूमिका बहुत अधिक आपत्तिजनक हो जाती है।


- रोहित शर्मा विश्वकर्मा

Monday, May 18, 2020

सरकार को कोरोना के बारे में पारदर्शी नीति बनानी चाहिए : राहुल गांधी


कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और केरल के वायनाड से लोकसभा सांसद राहुल गांधी ने पत्रकारों से पिछले दिनों बात करते हुए कहा कि केंद्र सरकार को पारदर्शिता अपनाते हुए लॉकडाउन को उठा लेना चाहिए और आर्थिक गतिविधियां शुरू करनी चाहिए। वास्तव में लॉकडाउन के बारे में पारदर्शी नीति होनी चाहिए, जिससे लॉकडाउन से संबंधित सभी विस्तृत विवरण दिया जाना चाहिए क्योंकि कोरोना के खि़लाफ लड़ी जाने वाली लड़ाई की वास्तविक तस्वीर कोई नहीं जानता। यह एक हास्यास्पद बात है कि सरकार ने लॉकडाउन लागू कर दिया और देश के तमाम नागरिकों को यह निर्देश दे दिया कि लॉकडाउन खत्म होने तक स्वयं को घरों में कैद कर लें और सभी आर्थिक गतिविधियां बंद कर दें। अब जबकि देशवासियों को लॉकडाउन का तीसरा चरण झेलना पड़ रहा है ऐसी स्थिति में सरकार कोरोना को काबू करने में बुरी तरह विफल हुई है। इसका सबूत यह है कि अब तक भारत में कोरोना मरीजों की संख्या तेजी़ से बढ़कर 90,927 हो गई है और जबकि इससे मरने वालों की संख्या 2,872 हो गई है। कोरोना से होने वाली कैज़ुअल्टी का जो हमने अंदाजा लगाया था, वह गलत साबित हुआ। इस प्रकार कोरोना महामारी ने जब हमारे दरवाज़े पर दस्तक दिया तो उस समय हमारी सरकार कोरोना महामारी के ख़तरे को लेकर लापरवाह थी। इसका अंदाजा़ इन तथ्यों से लगाया जा सकता है कि उस समय केंद्र सरकार मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार को गिराने और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार बनवाने में दिलचस्पी ले रही थी और भारत में अमरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आने पर उनके स्वागत की तैयारियों में जुटी हुई थी। यही कारण है कि कोरोना के भारत में आते ही इसको नियंत्रण करने की कोशिश नहीं की गई। यहां कांग्रेस नेता राहुल गांधी के उस बयान का ज़िक्र करना अप्रसांगिक नहीं होगा जिन्होंने 12 फरवरी को कोरोना से होने वाली पहली मौत पर भारत सरकार का ध्यान आकर्षित किया था। उस समय तक कोरोना ने चीन में तबाही मचा रखी थी जिसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि चीन में हजारों लोग कोरोना महामारी से मर गए। मोदी सरकार कोरोना महामारी के ख़तरे को लेकर मार्च के आखि़री सप्ताह में जागी जब कोरोना ने हमारे देश को अपने शिकंजे में जकड़ लिया। उस वक्त तक हमारे देश में 9 लोगों की मृत्यु कोरोना से हो गई थी और कोरोना के मरीजों की संख्या 468 पहुंच गई थी। कोरोना के ख़तरे को भाँपने के बाद मोदी सरकार ने आनन-फा़नन में देशभर में लॉकडाउन लागू करने का फैसला इसके नतीजे पर विचार किए बिना ले लिया। जब लॉकडाउन लागू किया गया तब विभिन्न समस्याएं सामने आईं जिनमें प्रवासी भारतीयों की समस्याएं प्रमुख हैं। लॉकडाउन के 53 दिन बीत जाने के बाद भी प्रवासी मज़दूरों की समस्याएं जस का तस हैं। प्रवासी मज़दूरों को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, उनमें रहने, खाने-पीने और अपने मूल स्थान को जाने के लिए यातायात साधन की अनुपलब्धता की समस्याएं शामिल है। लाखों प्रवासी मज़दूरों को पूरे देश में इसी तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यद्यपि केंद्र और राज्य सरकारें इस बात का दावा कर रही है कि प्रवासी मजदूरों के भोजन और रहने-सहने का प्रबंध किया जा रहा है और साथ मेें उन्हें वित्तीय मदद भी दी जा रही है। लेकिन इनके इन दावों में आधी सच्चाई ही पाई जाती है क्योंकि देश के विभिन्न भागों में प्रवासी मज़दूर सड़कों पर आ गए हैं और स्वयं को अपने मूल निवास तक पहुँचाए जाने की यह शिकायत करते हुए मांग करने लगे कि उनके खाने-पीन औरे रहने-सहने का कोई प्रबंध नहीं है। यह स्थिति लॉकडाउन से पैदा होने वाली समस्याओं से निपटने से संबंधित सरकार की आधी-अधूरी तैयारियों का नतीजा है। कोरोना महामारी के खि़लाफ लड़ाई लड़ने के बारे में केंद्र सरकार द्वारा बहुत विचार-विमर्श नहीं किया गया। ज्ञात हो कि उन देशों में लॉकडाउन लागू कर दिया गया जहाँ हजारों लोग कोरोना महामारी से मर गए। इस प्रकार हमारी केंद्र सरकार ने भी कोरोना महामारी से लड़ने के लिए लॉकडाउन का रास्ता अपनाया और इस तरह पूरे देश में लॉकडाउन लगा दिया। वें टीवी चैनल जो मोदी सरकार की चाटुकारिता करते थकते नहीं वें लॉकडाउन को लगाए जाने के सरकार के कदम की प्रशंसा कर रहे हैं और मोदी की छवि को कोरोना महामारी से बचाने वाला हीरो के रूप में पेश कर रही हैं। अब कोरोना हमारे देश में बहुत तेजी़ से फैल रहा है और वर्तमान में कोरोना मरीजों की संख्या 90,000 तक हो गई है और यह रुझान लगातार जारी हैं। जो टीवी चैनल प्रधानमंत्री मोदी को कोरोना महामारी को ख़त्म करने के सिलसिले में विश्व का नायक मान रहे थें और कोरोना से पीड़ित देशों को संजीवनी बांट रहे थे तो सवाल उठता है कि प्रधानमंत्री मोदी उस संजीवनी का प्रयोग अपने देश में क्यों नहीं कर रहे हैं? जबकि उस संजीवनी की देश में कोरोना महामारी के तेजी से बढ़ने के कारण सख्त जरूरत है। अनुमान लगाया जा रहा है कि देश में कोरोना मरीजों की संख्या जुलाई के अंत तक करीब 1.5 लाख हो जाएगी। इसके बावजूद जो चैनल मोदी की चाटुकारिता कर रहे हैं, वह अभी भी उसी नीति को अपनाए हुए हैं। यह आश्चर्य की बात है कि यें चैनल भारत में कोरोना से लड़ाई के तरीके को बेशर्मी से विश्व का मॉडल बता रहे हैं और उन देशों का उल्लेख तक नहीं कर रहे हैं जो कोरोना से लड़ाई के संबंध में वास्तव में विश्व मॉडल हैं। इन देशों में दक्षिण कोरिया और ताईवान मुख्य रूप से शामिल हैं। वास्तव में यें चैनल मोदी की चाटुकारिता करने के कारण संकीर्ण मानसिकता रखते हैं। इसलिए जो देश कोरोना के खि़लाफ लड़ाई में विश्व मॉडल बने हुए हैं उन्हें देख पाने में यें चैनल असमर्थ हैं। दक्षिण कोरिया में कोरोना के मरीजों की संख्या 10,000 थी जबकि कोरोना से मरने वालों की संख्या केवल 259 थीं। इसी तरह ताईवान कोरोना के खि़लाफ लड़ाई में विश्व का सबसे बेहतर मॉडल माना जा रहा है क्योंकि यहां कोरोना महामारी समाज में अपने वायरस को फैलाने में सफल नहीं हो पाई। इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि ताईवान में कोरोना महामारी के मात्र 440 मरीज़ पाए गए जबकि इससे मरने वालों की संख्या कुल 7 थीं। यह नतीजा दक्षिण कोरिया और ताईवान में कोरोना के खि़लाफ लड़ाई में उक्त नतीजा बिना लॉकडाउन लगाए हासिल हुआ। ज्ञात रहे कि यह दोनों देश भारत की तरह चाईना से सटे हुए हैं।

सच्चाई यह है कि कोरोना के खि़लाफ लडे़ जाने वाले हमारे तरीके की कोई देश प्रशंसा नहीं कर रहा है क्योंकि कोरोना महामारी से लड़ाई के संबंध में हम कोई प्रशंसनीय तरीके विश्व के सामने पेश नहीं कर सके हैं। लॉकडाउन के तीसरे दौर का ख़ात्मा आगामी 17 मई को हो रहा है और इसे और आगे बढ़ाया जाएगा जिसमें बहुत सारी रियायतें इसलिए दी जाएंगी ताकि लॉकडाउन के कारण पटरी से उतरी अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाया जा सके। इस बीच प्रधानमंत्री मोदी ने 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज का ऐलान किया है जिसका मकसद भारत को आत्मनिर्भर बनाना है। उन्होंने भारत को आत्मनिर्भर बनाने के तरीके की व्याख्या की है। यह अच्छी बात है और हम सभी भारतीयों को प्रधानमंत्री के सपने को सच करने के संबंध में प्रयास करना चाहिए। प्रधानमंत्री के आर्थिक पैकेज के बारे में यह कहा जा रहा है कि इसको बड़ा दिखाने के लिए उन्होंने सरकार द्वारा पहले से चलाई जा रही योजनाओं को भी अपनी 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज में शामिल कर दिया है। प्रधानमंत्री द्वारा घोषित आर्थिक पैकेज भारतवासियों के लिए कोई नया पैकेज नहीं है क्योंकि इस तरह के पैकेज का ऐलान कोरोना महामारी से पीड़ित जनता के लिए विश्व के कई देश पहले से ही कर चुके हैं। जिनका मकसद वास्तव में अपनी जनता की भलाई है ना कि दिखावा। हमारे देश के आर्थिक पैकेज से उन 8 करोड़ प्रवासी श्रमिकों का कोई भला होने वाला नहीं जो देश के विभिन्न हिस्सों से अपने मूल स्थान पहुँचने के लिए पैदल सफ़र करते हुए नजर आ रहे हैं।



- रोहित शर्मा विश्वकर्मा।

Sunday, May 17, 2020

Government should make transparent policy about Corona : Rahul Gandhi



Mr. Rahul Gandhi, former President of Indian National Congress and Member of Parliament from Wayanad (Kerala) addressing to journalists said that the Central Government should lift the present lockdown for starting the economic activities in the country with transparent policy on it. In fact it was very necessary that a transparent policy about lockdown should had been made by the Central Government in which all details about imposement of lockdown should be clarified. As no one knows about the actual picture of fighting with Corona by the government. It is a ridiculous matter that an order of improvement of lockdown was released instructing the peoples of India to close down their economic activities and remain inside their homes till the expiry date of lockdown. Now all people of India have been facing third phase of lockdown but the Central Government seems unable to control Corona epidemic in the country because update about Corona epidemic in the country suggest that it has been spreading very speedly as today the positive cases of Covid-19 have reached to 85,940 cases and total number of death from Corona reaches to 2252. Thus our earlier estimate about the casualty of Corona proves wrong in the very beginning when Corona epidemic knocked our doors. At that time our government was unconcerned about the danger of Corona. This is clear from these fact that at that time Modi government was busy in pulling out of Congress government in Madhya Pradesh made by Kamalnath and stalling there BJP government. Besides preparation for a grand reception for American President Donald Trump was being made by Modi government at that time. It is the reason that no step was taken to control the spread of Corona in the beginning. It will be not irrelevant here to quote the statement of Congress leader Rahul Gandhi who had attracted the attention of Central Government towards the first Corona case in the country in the month of February 12. At that time Corona had calls havoc in China where thousands and thousands of people fell fray of Corona. Modi government woke up about the danger of Corona epidemic in the last week of March when Corona took over country in its clutchfully. Till that time 9 peoples have died of Corona and 468 people found Corona positive. After woking up of danger of Corona Modi government took decision of imposing of lockdown in the country hurriedly without considering the result. When lockdown was imposed, then a number of problems came up in which difficulties of migrant labourers began come into light. After passing of 52 days of lockdown difficulties of migrant labourers still continued. The difficulties being faced by the migrant labourers are non availability of food, shelters and unavailability of transport for going to their hometowns. Lacs of migrant labourers facing the same situation in all over the country while the Central Government and State Government has been claiming of providing them food, shelters and financial help but there was half truth in their claim because in a number of places in all over country migrant labourers came out on streets and demanded to be sent them to their hometowns. This situation is result of half preparedness of the government for tackling the problems created after the imposement of lockdown. How to fight the danger of Corona, it was not well considered by the Central Government? It found that lockdown was imposed in the countries where Corona has claimed thousands of lives. Thus Central Government also decided to go on this way for fighting with Corona and imposed lockdown in all over the country. Those TV channels which have been licking the boots of Modi government, praise the step of imposement of lockdown by the government and present the image of Modi as a saviour of the world from Corona epidemic. Now Corona has been spreading very speedly in our country and at present more than eighty thousand people have become Corona patient in our country and this trend is continued. It has been being estimated that till the end of July, the number of patients of Corona epidemic will reach to near about 1.5 lacs. Instead of it those channel to have adopted the policy of sycophancy of Modi government are still praising the step of imposement of lockdown. It is a matter of strange that these channels are calling these steps of the government as world model which is being praised by UNO. In fact these channels are very narrow minded because of their policy of sycophancy of the government, so they are unable to see actual model for fighting with Corona epidemic in the world. In South Korea only 11037 people were reported Corona positive patients while dead toll from Corona which 262 only. In the same way Taiwan is the best model for the world for fighting with Corona epidemic where Corona epidemic could not make way for inflicting its virus in the society as here 440 Corona positive cases were reported and 7 people are reported died of Corona. Now the sycophance channels of Modi should itself decide which country of the world is the actual model for fighting with Corona epidemic.

The truth is that our method of fighting with Corona epidemic is not being praised by any country of the world because we did not present any praiseworthy method for fighting with Corona epidemic. The third phase of lockdown in our country is going to end on May 17 and it will be extended furthur in which much more relaxation will be given for bringing derailed economy of the country back on track. Meanwhile Prime Minister Narendra Modi has announced an economic package of rupees 20 lac crore with the aim of making India self-reliance. He has explained the way how to India make self-reliance. It is a good thing and all of us must endeavour for bringing this dream of Prime Minister bring into reality. It is said that those government schemes implemented earlier has been also included in the economic package of rupees 20 lac crore for presenting this package as a very big package. It should be also remember here that the economic package announced by the PM Narendra Modi is not quite new for our countrymen because such types of economic package have been earlier announced by many Corona affected countries of the world for help of their citizens in real sense not for histrionism. It is also fact that there is no place for benefiting of near about 8 crore migrant labourers working in different parts of the country and these are now seem travelling on foot to reach there hometowns.

Here we should remember the statement made by Rahul Gandhi before a few weeks ago in which he had demanded transparent policy about lockdown and bringing the derailed economy of the country back on track. It seems that Modi government took notice about the concerned of Rahul Gandhi regarding stalled economy and need of transparent policy for lockdown. The fourth phase of lockdown will start from May 18 for which government has decided to give more relaxation in the rules of lockdown. All these steps are going to be taken keeping in mind for restarting of normal life of the people of India considering it that Corona epidemic will exist and we cannot stop all our activities under the fear of Corona indefinitely. However the fight against Corona will be continue.

- Rohit Sharma Vishwakarma


Friday, May 8, 2020

Irrfan Khan will always be remembered for his heart touching actings.

Death is undeniable truth. Who have born, he will must die one day. It is a common fact that people forget those who live the world for their heavenly abode, but there are a few persons who are always be remembered for this good thinkings and good acts either they are related to any field of life. Irrfan Khan includes in such a group of persons who have been mentioned in the earlier line. Stage and films are such mediums which are given much importance by our society as these mediums work for the guidance of the society. It is the reason stage and film actors all seem as a revered personlaties in our society and those who win the heart of the people by their unparallel actings become the ideals of society. Irrfan Khan was one of him who always won the praises of people for his heart touching actings. His films like 'Maqbool', 'Hasil', 'Piku', 'The Namesake', 'Rog', 'Pan Singh Tomar', 'Angrezi Medium', 'Hindi Medium', 'Life in a... Metro', 'Billu Barber', 'The Lunch box', 'Salam Bombay', 'Kali Salwar', 'Supari', 'Right ya wrong', 'Footpath', 'Haider' etc. are films which present the bitter truth of the society. As far as audience are concerned they are compelled to praise his actings with open hearts. Infact all his films are concerned with the social issues haunting the society. The names of his films itself indicate towards the bitter issues of the society. It seems that when any producer wanted to make a film on bitter reality of the society. He was compelled to sign Irrfan Khan as a Hero in such a film as the producer knew about Irrfan Khan's ability to turn the character into real life and when Cine goers watched the film, they become spellbound after seeing the acting of Irrfan Khan in the film and they come to the conclusion that Irrfan Khan bring life in the character for which he has been signed.

The film career of Irrfan Khan was full of struggle. Although he started struggle in the film industry in 1988 with a character role in the film 'Salaam Bombay' but he was not recognised as a Hero till 2003. In this year two films 'Maqbool' and 'Hasil' brought popularity for him and gave him recognisation as a hero. During his struggle period, he opted for television screen for earning his livelihood. He played the lead role in the number of television serials for which he gained praise and appreciation from TV viewers like 'Chanakya', 'Bharat Ek Khoj', 'Banegi Apni Baat', 'Sara Jahan Hamara', 'Shrikant', 'Anugoonj', 'The Great Maratha', presented his talent before the viewers and got honour from them.

Irfan Khan was a bachelor from National School of Drama (NSD) where he found opportunity for accomplishing his talent of acting. Infact the training in NSD prepared him as an actor and when he entered the field of acting he got acknowledged his actings caliber. Hi tried his luck in Hollywood also where he was welcomed with open arms. The films 'The Amazing Spider-Man', 'Life of pi', 'Jurrasic World', 'Inferno' show his substance stories in Hollywood.

For his super and fabulous actings in Hindi film he had been awarded with a number of prestigious awards in which 4 Filmfare Awards, 4 Screen Awards, 1 Stardust Awards, 2 Producers Guild Film Awards are included. Besides these awards Government of India also honoured him with 'Padma Shri' Award. It will not be irrelevant to say it that he had been brand ambassador of Government of Rajasthan till his death.

According to the film critics no hero of present day can match his acting with the acting of Irrfan Khan. After his demise the space left by him cannot be filled. In the last comment made by film critic of 'The Guardian' (London Newspaper) Mr. Peter Bradshaw about the acting of Irrfan Khan also indicates towards the greatness of his acting. He describes about Irrfan Khan as
 "a distinguished and charismatic star in Hindi and English-language movies whose hardworking career was an enormously valuable bridge between South Asian and Hollywood cinema".

Irrfan Khan was a liberal Muslim who did not like fundamentalism propagated by Muslim clerics. It will be not irrelevant to quote here his mother statements about his film career. When his mother came to know that he is working as a film hero, she had expressed her displeasure. In the film industry he was seen as a respectable actor and had good relationship with all his fellow actors, actresses, producers and other people of the film industry.

- Rohit Sharma Vishwakarma

Monday, May 4, 2020

इरफ़ान खान दिल को छू लेने वाले अभिनय के लिए हमेशा याद किए जाएंगे।

मृत्यु एक ऐसा सच है जिससे इंकार नहीं किया जा सकता। जो पैदा हुआ है वह एक दिन अवश्य मरेगा। ये एक खुली सच्चाई है कि लोग मरने वालों कों भूल जाते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपनी अच्छी सोच और अपने कार्यों के लिए याद किए जाते हैं चाहे उनका संबंध किसी भी कार्य क्षेत्र से हो। इरफ़ान खान ऐसे ही लोगों में शामिल हैं जिनका उल्लेख पिछले वाक्य में हुआ है। रंगमंच और फिल्मों को हमारे समाज द्वारा काफी महत्व दिया जाता है क्योंकि यह माध्यम समाज को राह दिखाने का महत्वपूर्ण काम करते हैं। यही कारण है कि रंगमंच के कलाकार और फिल्म अभिनेताओं को समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है और ये लोग समाज के आदर्श बन जाते हैं क्योंकि अपने अभूतपूर्व अभिनय के कारण लोगों का दिल जीत लेते हैं। इरफ़ान खान उनमें से एक हैं जिन्होंने अपने अभूतपूर्व अभिनय से लोगों की प्रशंसा और सराहना अपनी फिल्मों 'मक़बूल', 'हासिल', 'पीकू', 'द नेमसेक', 'रोग', 'पान सिंह तोमर', 'हिन्दी मीडियम', 'अंग्रेज़ी मीडियम', 'लाइफ इन अ मेट्रो', 'बिल्लू बारबर', 'द लंच बॉक्स', 'सलाम बोम्बे', 'काली सलवार', 'सुपारी', 'राइट या रोन्ग', 'तलवार', 'हैदर' आदि  में किए गए अभिनय के कारण प्राप्त किया जिनमें समाज की कड़वी सच्चाइयों को पेश किया गया है। जहाँ तक दर्शकों का संबंध है उन्होंने खुले दिल से इरफ़ान की प्रशंसा और सराहना की। वास्तविकता यह है कि इरफ़ान की सभी फिल्में सामाजिक विषयों पर बनी है जो समाज को परेशान करती थीं। इनकी फिल्मों के नाम से भी यह ज़ाहिर होता है कि इनकी फिल्में समाज की कड़वीं सच्चाईयों को करती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि जब कोई फिल्म निर्माता समाज की कड़वी सच्चाईयों को प्रदर्शित करने वाला कोई विषय चुनता था तो वो ऐसी फिल्म के लिए बतौर हीरो इरफ़ान खान को साइन करने के लिए मजबूर होता था क्योंकि ऐसे सभी फ़िल्म निर्माता यह जानते थे कि इरफ़ान खान को जो भी भूमिका दी जाएगी तो वो अपने अभिनय से इसे जीवंत कर देंगे और जब सिनेमा दर्शक इरफ़ान खान की फिल्मों को देखते थे तो इरफ़ान खान के अभिनय को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते थे और वें इस नतीजे पर पहुँचते थे कि इरफ़ान खान अपने किरदार को जीवन प्रदान कर देते हैं जिसकी भूमिका निभाने के लिए उनको चुना जाता है।

इरफ़ान खान का फिल्मी सफ़र बेहद संघर्षपूर्ण रहा। हालांकि उन्होंने अपने फिल्मी सफ़र का आगाज़ 1988 में आई फिल्म 'सलाम बॉम्बे' में एक छोटी सी भूमिका के साथ किया लेकिन उन्हें हीरो के तौर पर मान्यता नहीं मिली लेकिन उन्हें लम्बे समय तक बतौर हीरो मान्यता नहीं मिली। 2003 में जब उनकी दो फिल्में 'मक़बूल' और 'हासिल' प्रदर्शित हुई तब वो बतौर हीरो जाने गए और फिर आने वाली उनकी सभी फिल्मों ने लोकप्रियता हासिल की। अपने संघर्ष के दिनों में उन्होंने अपनी जीविका कमाने के लिए टेलीविज़न स्क्रीन के लिए काम किया और कई धारावाहिकों में यादगार भूमिकाएं निभाई। उनके इन धारावाहिकों में 'चाणक्या', 'भारत एक खोज', 'बनेगी अपनी बात', 'सारा जहाँ हमारा', 'श्रीकांत', 'अनुगूंज', 'स्टार बेस्टसेलर्स', 'स्पर्श', 'द ग्रेट मराठा' यह शामिल हैं। इरफ़ान खान ने इन धारावाहिकों में अपने टैलेंट को पेश किया और टीवी दर्शकों से प्रशंसा और सम्मान हासिल किया।

इरफ़ान खान 'राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय' (एनएसडी) के स्नातक हैं जहाँ उनको अपने टैलेंट को निखारने का अवसर प्राप्त हुआ। वास्तव में एनएसडी के प्रशिक्षण ने उन्हें अभिनेता बना दिया और जब वे अभिनय के मैदान में उतरे तो उन्होंने अपने अभिनय का लौहा मनवाया। उन्होंने हॉलीवुड में भी अपनी किस्मत को आज़माया जहाँ उनका स्वागत खुले दिल से किया गया। उनकी फिल्में 'द अमेज़िंग स्पाईडर', 'लाईफ ऑफ पाई', 'जुरासिक वर्ल्ड', ' इनफेरनो' हॉलीवुड में उनके सफ़र की कामयाबी की कहानी बताती है। हिंदी फिल्मों में अपने सुपर और उम्दा अभिनय के लिए इन्हें बहुत सारे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाज़ा गया जिनमें 4 फिल्मफेयर पुरस्कार, 4 स्क्रीन पुरस्कार, 1 स्टारडस्ट पुरस्कार, 2 प्रोड्यूसर गिल्ड फिल्म पुरस्कार शामिल हैं। इसके अलावा भारत सरकार द्वारा भी इन्हें 'पद्म श्री' सम्मान से भी नवाज़ा गया। यहाँ यह उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा कि वो अपनी मृत्यु तक राजस्थान सरकार के ब्रैंड एंबेसेडर रहे।

फिल्म समीक्षकों के अनुसार आज के दौर का कोई भी अभिनेता अभिनय के क्षेत्र में इरफ़ान खान का मुकाबला नहीं कर सकता है। उनकी मृत्यु के बाद उनकी रिक्त जगह को पूरा करना संभव नहीं है। अंत में लंडन के समाचार पत्र 'द गार्ज़ियन' के फिल्म समीक्षक पीटर ब्रैडशॉ द्वारा इरफ़ान खान के अभिनय के बारे में की गई इस टिप्पणी से भी उनके अभिनय की महानता का पता चलता है। जिसमें उन्होंने कहा "हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा के फिल्मों के एक विशिष्ट और करिश्माई अभिनेता जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से साउथ एशियन फिल्मों और हॉलीवुड फिल्मों के बीच एक बहुमूल्य पुल बनाने का काम किया।"              

इरफ़ान खान एक उदारवादी मुसलमान थे और मुस्लिम उलेमा द्वारा प्रचारित किए जाने वाले इस्लामी कट्टरपंथ को बिल्कुल पसंद नहीं करते थे। यहां उनकी माता द्वारा उनके फिल्मी करियर के बारे में किए गए बयान का ज़िक्र करना अप्रासंगिक नहीं होगा। जब उनकी माँ को पता चला कि इरफ़ान फिल्मों में काम करने लगे हैं तो उन्होंने इस पर अपनी अप्रसन्नता व्यक्त की। फिल्म उद्योग में वो सम्मान के दृष्टि से देखे जाते थे और अपने सभी सह - कलाकारों, निर्देशकों, निर्माताओं व फिल्म जगत के दूसरे लोगों के साथ उनके अच्छे संबंध रहे।


- रोहित शर्मा विश्वकर्मा।

यूक्रेन रूस का 'आसान निवाला' नहीं बन पाएगा

रूस द्वारा यूक्रेन पर हमले का आज चौथा दिन है और रूस के इरादों से ऐसा लग रहा है कि रूस अपने हमलों को ज़ारी रखेगा। यद्यपि दुनिया के सारे देश रू...