Thursday, February 27, 2020

मोहन भागवत में दूरदर्शिता की कमी।

अहमदाबाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवकों की एक सभा को 16 फरवरी को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुखिया मोहन भागवत ने हिंदू समाज में तलाक के बढ़ते हुए ग्राफ पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इससे हिंदू समाज में बिखराव पैदा हो रहा है। इसका कारण शिक्षा के फैलाव और लोगों में आई संपन्नता है। इससे पता चलता है कि मोहन भागवत की सोच बदलते समाज के खिलाफ है। इससे यह भी पता चलता है कि आरएसएस और इसके मुखिया समाज में हो रहे सकारात्मक परिवर्तन के खिलाफ हैं। यह स्मरणीय रहे कि भारत में हिंदू समाज हिंदू कानून द्वारा संचालित होते हैं न कि परंपरा और रूढ़ियों द्वारा। हिंदू कानून में तलाक का प्रावधान सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान है। जब तलाक का प्रावधान हिंदू समाज में नहीं था तो हिंदू समाज में महिलाओं को जलाए जाने की घटनाएं सामान्य थीं। इस प्रकार हिंदू महिलाएं अमानवीय यातनाओं की शिकार थीं। तलाक के प्रावधान के सामने आने पर हिंदू महिलाओं की स्थिति में बदलाव आया क्योंकि उन्हें उल्लेखनीय मात्रा में स्वतंत्रता प्राप्त हुई। अब हिंदू पुरुष और महिलाएं अपने विवाहित संबंधों को खत्म करने के लिए अदालत का रास्ता अपना रहे हैं अगर वें समझते हैं कि उनका पारिवारिक जीवन सुचारू रूप से नहीं चल पा रहा है क्योंकि वें अब अनचाहे विवाहित जीवन को गुजारने के लिए मजबूर नहीं है। अब जबकि उन्हें अपने संबंधों को समाप्त करने की सुविधा प्राप्त हो गई है तो वें इस सुविधा को शांतिपूर्ण बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। सवाल यह उठता है कि श्रीभागवत हिंदू पुरुष और महिलाओं को शांतिपूर्ण विवाहित जीवन गुजारने नहीं देना चाहते जो अदालत अपने संबंधों को विच्छेद कराने के लिए जाते हैं? जीवन से महत्वपूर्ण चीज़ मन और घर के वातावरण की शांति है। अगर ये दोनों शांति नहीं है तो जीवन नरक बन जाता है। इसलिए श्री भागवत को तलाक की बढ़ती हुई घटनाओं पर चिंता व्यक्त करने की अपनी सोच पर पुनर्विचार करना चाहिए क्योंकि तलाक पति-पत्नी के बीच अनसुलझे तनाव के नतीजे में पैदा हुए असहनीय दुखों के खात्मे का शांतिपूर्ण तरीका है।       

मोहन भागवत का यह बयान घोर महिला विरोधी है और घोर संविधान विरोधी भी है क्योंकि संविधान द्वारा महिलाओं को पुरुषों जैसा अधिकार दिया गया है और हिंदू कानून में महिलाओं को तलाक का अधिकार इसीलिए दिया गया है ताकि वें पुरुषों से अपना विवाहित संबंध ऐसी स्थिति में विच्छेद कर सके जब उनके लिए विवाहित जीवन गुजारना असंभव हो जाए।


- रोहित शर्मा विश्वकर्मा


Lack of farsightedness of Mohan Bhagwat

Addressing to a gathering of Swayamsewak workers on February 16 in Ahmedabad, Sarsanghchalak Mohan Bhagwat expressed his concerned on the rising graph of Divorce (Talaq) in Hindu society and said that it had been causing dissemination in the Hindu society. The Reason is the spread of education and the richness enjoyed by the people. This thinking of Mohan Bhagwat is against the tide of the time. It also shows that Rashtriya Swayamsewak Sangh (RSS) and its Chief are against the positive changes took place in the society. It should be remembered that Hindu Society of India is governed by the Hindu act in place of Hindu tradition and dogmas. The Most important of Hindu law is the provision of Divorce. When the provision of Divorce was not introduce in the Hindu society and no way was available, Women burning incidents were common. Thus Hindus women pray of inhuman acts. After introduction of Divorce provision, the condition of Hindu women and changed resulting in they have been enjoying noteable quantity of freedom. Now Hindu men and women both oftenly go to court for ending their marriages, if they feel that their married life cannot be smoothly go ahead, because they are not compelled to lead a married life unwantedly. While they have facilities of getting their relationship end, they have been using it for leading a peaceful life. Question raises Does Mr. Bhagwat not want peaceful life of Hindu men and women, who go to Court for separation from each other? The Most important thing in the life is the peace of mind and peace in the atmosphere at home. If this is missed, the life becomes hell.

Mr. Bhagwat should rethink about his concerned for rising graph of Divorce as the Divorce is the peaceful way of ending miseries of Husband & Wife because of creation of unsolved tension in their relationship.


- Rohit Sharma Vishwakarma

केजरीवाल ने दोबारा 'हिंदुत्वा' लहर को मात दे दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके लेफ्टिनेंट अमित शाह ने दिल्ली विधानसभा चुनाव जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। इसके बावजूद उन्हें अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा और अब वें अपने ज़ख्मों को चाट रहे होंगे। अब यह समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के लिए गंभीरता से सोचने के लिए है कि किस तरह अरविंद केजरीवाल को भविष्य में हराया जाए? हम सब ने देखा कि चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने शाहीन बाग़ के मुद्दे को पूरी ताकत से उठाकर दिल्ली के वातावरण का किस तरह धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण किया? वास्तव में दिल्ली में चुनावी मुद्दों को धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण का प्रयास दिल्ली में सफल नहीं हुआ। यह बात 2015 के विधानसभा चुनावों में साबित हुई और यही बात इस बार के विधानसभा चुनावों में भी साबित हुई। इसलिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए यह स्पष्ट सबक है कि दिल्ली का विधानसभा चुनाव सांप्रदायिक मुद्दों के आधार पर नहीं जीता जा सकता। अगर केंद्र की भाजपा सरकार ने लोगों के लिए हितकारी काम किए होते और उनका दिल जीता होता तो निश्चय ही दिल्ली वाले भाजपा को चुनाव में अपना समर्थन देते जिसके नतीजे में पार्टी दिल्ली में सत्ता में पहुंचती। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार का एक प्रमुख कारण यह भी है कि दिल्ली नगर निगम में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। इसके अलावा पार्षदों द्वारा कोई विकास कार्य नहीं किए गए। यह बात स्मरणीय है कि दिल्लीवासियों ने विधानसभा चुनावों के दौरान दिल्ली नगर निगम द्वारा विकास कार्य न किए जाने की खुलकर आलोचना की। इसके विपरीत केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा चुनाव भारी बहुमत से जीता क्योंकि उन्होंने 2015 में चुनाव के दौरान दिल्ली की जनता से जो वादे किए थे उसे पूरा किया। उन्होंने इस चुनाव में दिल्लीवासियों से और चुनावी वादे किए जिसपर दिल्ली वालों ने उनपर भरोसा किया और उन्हें फिर सत्ता में ले आए। जनता की भावनाओं को सम्मान देना अच्छी राजनीति का संकेत है। केजरीवाल ने यह किया और इसकी बुनियाद पर फिर सत्ता में आए। अब जबकि वो इस तथ्य को जान गए हैं तो उम्मीद की जाती है कि वो मतदाताओं की भावनाओं को नजरअंदाज करने की गलती नहीं करेंगे। केजरीवाल की छवि ऐसे राजनीतिज्ञ की उभरी है जो शेखी नहीं बघारता बल्कि काम करता है। यही कारण है कि केजरीवाल को मतदाताओं ने भारी समर्थन दिया और उन्हें सत्तासीन किया। हम सबको उम्मीद है कि केजरीवाल ने चुनाव जीतने का जादू जान लिया है और इसलिए वो इसे भूलेंगे नहीं और भविष्य में मतदाताओं की भावनाओं का सम्मान करते रहेंगे।


- रोहित शर्मा विश्वकर्मा


Kejriwal again defeated 'The Hindutva' wave.

Prime Minister Narendra Modi and his Lieutenant Amit Shah by throwing all possible forces in Delhi Assembly elections for winning it. They faced humiliated defeat and how they would have been licking their wounds. Now it is the time for PM Narendra Modi and HM Amit Shah to ponder it seriously how to defeat Arvind Kejriwal in the future assembly elections? All of us saw how Narendra Modi and Amit Shah both for winning Delhi assembly elections Communalize the atmosphere of Delhi by raising the Shaheen Bagh issue with full strength? Infact Delhi is the state where communalization of issues for winning the elections does not have beneficial. It happened in 2015 and it happened now too. So, it is very clear lesson for the Bharatiya Janata Party (BJP) that Delhi assembly elections could not be won on communal issues. In the Central Government of the BJP would have performed well and would have own the heads of people of India, then Delhities would have necessarily supported the BJP in the Delhi assembly elections resulting in the BJP would come into power in Delhi this time. One of the main reason of defeat of the BJP in the Delhi assembly elections is corruptions pervaded in Delhi Metro corruptions. Beside it, no development works were delivered by the BJP corporators. Peoples of Delhi have been openly complaining about the non-performance of BJP corporators during the assembly elections. On the contrary Kejriwal won the assembly elections with thumping majority because of the fulfillment of its promises made by him in the last assembly elections. He again promised of delivering them on which Delhities trusted him and brought again into the power. To give respect to the feelings of peoples by a Politician is a good sign of healthy Politics. Kejriwal did it and came into power again on this quality. Now, when he has understood this fact very well, it is understood that he will not commit mistakes of ignoring the feelings of the people. The image of Kejriwal emerged as a Politician who do not boast but perform and such Politician always loved by the people. It is the reason that Kejriwal was supported and brought into the power third time. All of us hopes that Kejriwal has learned the magic of winning the elections, so he will not forget it and will go ahead of respecting the feelings of the people in the future too.


- Rohit Sharma Vishwakarma

क्या केजरीवाल मोदी को एक बार फिर बौना बना देंगे?

अब जबकि दिल्ली विधानसभा चुनाव के होने में मात्र 1 दिन बाकी रह गया है फिर भी किसी पार्टी के यहां सत्ता में आने का स्पष्ट संकेत नहीं मिल रहा है। यहां के विधानसभा चुनाव में तीन पार्टियां चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आज़मा रही हैं इनमें सत्ताधारी 'आम आदमी पार्टी' (आप), 'भारतीय जनता पार्टी' (भाजपा) और 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी' (आईएनसी) हैं। सत्ताधारी आम आदमी पार्टी पिछले 5 सालों के दौरान अपने द्वारा किए गए कामों के बल पर यह चुनाव लड़ रही है जबकि भाजपा ये चुनाव आप सरकार की नाकामियों को उजागर कर ये चुनाव लड़ रही है और कांग्रेस पार्टी 15 साल की शीला दीक्षित सरकार के दौरान हुए विकास कार्यों को याद दिला कर मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं।

जहाँ तक आप पार्टी की सरकार का संबंध है इसके बारे में दिल्लीवासियों की आमतौर में यह राय है कि आप सरकार द्वारा ऐसी बहुत सी उपलब्धियां दिल्लीवालों को उपलब्ध कराई गई हैं जो इससे पहले की सरकारों द्वारा नहीं कराए गए हैं जैसे कि शिक्षा के क्षेत्र में सरकार द्वारा उल्लेखनीय काम किए गए हैं। आप सरकार द्वारा यहां के सरकारी स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता के स्तर को पब्लिक स्कूलों की शिक्षा के स्तर तक पहुँचाया गया है। इसके अलावा आप सरकार ने गरीब बच्चों के दाखिले को प्राइवेट स्कूलों में सुनिश्चित कराया है। इस सरकार द्वारा प्राइवेट स्कूलों के प्रबंधन पर दबाव डालकर गरीब तबके के बच्चों की एक निश्चित प्रतिशत में दाखिले का प्रबंध किया गया है। इसके द्वारा दिल्ली में बिना रुकावट 24 घंटे बिजली की आपूर्ति और दिल्लीवासियों को साफ पीने के पानी का प्रबंध कराया गया है। स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में केजरीवाल सरकार ने अस्पतालों की खराब स्थिति को बेहतर बनाया और यहाँ मरीजों को दवाओं की आपूर्ति की स्थिति को बेहतर बनाया। न सिर्फ ये बल्कि मरीजों को ज़्यादा से ज़्यादा स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की कोशिश की गई। इस सरकार की स्वास्थ्य क्षेत्र में सबसे उल्लेखनीय सुविधाएं यें है कि इसके द्वारा दिल्लीवासियों को उनके दरवाजे तक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 'मोहल्ला क्लीनिक' की स्थापना की गई। यहां यह बात याद रखने योग्य है कि 'मोहल्ला क्लीनिक' की स्थापना की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा और सराहना की गई। यह सरकार दिल्ली के आधारभूत ढाँचे के विकास में भी पीछे नहीं है। यद्यपि इस सरकार द्वारा कोई नया फ्लाईओवर नहीं बनवाया गया फिर भी दिल्ली में मुख्य सड़कों और गलियों की सड़कों के निर्माण पर काफी ध्यान दिया गया। इस सरकार के तहत दिल्ली के हर कोने को रौशन बना बना दिया गया जिसके नतीजे में दिल्ली में अपराध के ग्राफ में कमी आई है जैसे चेन झपटमारी, महिलाओं से संबंधित अपराध और सेंधमारी आदि के अपराध में काफी कमी आई है। केजरीकल सरकार द्वारा पूरी दिल्ली में 1.5 लाख सीसीटीवी केमरों की स्थापना ने दिल्ली में संगीन अपराधों की रोकथाम में बड़ी भूमिका निभाई है। इस सरकार द्वारा किया गया यह काम काफी प्रशंसनीय और सराहनीय है। केजरीवाल सरकार द्वारा दिल्ली की महिलाओं को डीटीसी बस में मुफ्त सेवा उपलब्ध कराई गई है जो भविष्य में भी लागू रहेगी। इसके अलावा इस सरकार द्वारा वरिष्ठ नागरिकों को मुफ्त तीर्थ यात्रा की सेवा उपलब्ध कराई जा रही है। दिल्लीवासी मुक्त कंठ से यह भी स्वीकारते हैं कि अरविंद केजरीवाल सरकार द्वारा पहली बार भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन उपलब्ध कराया जा रहा है। केजरीवाल सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जा रही इन सारी सुविधाओं ने दिल्ली के लोगों का दिल जीत लिया है इसलिए वें इस सरकार की प्रशंसा का रहे हैं। यही कारण है कि केजरीवाल अपनी सरकार द्वारा किए गए कार्यों का रिपोर्ट कार्ड पेश करके यह चुनाव लड़ रहे हैं। इस चुनाव में वों 10 प्रमुख सेवाओं को उपलब्ध कराने की गारंटी दे रहे हैं। और यह सभी 10 सेवाएं रोज़मर्रा के जीवन से संबंधित हैं।             

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का कहना है कि दिल्लीवासी उनकी सरकार के कामों के आधार पर उनकी पार्टी का जोरदार तरीके से समर्थन कर रहे हैं। जिसके नतीजे में उनकी पार्टी एक बार फिर सत्ता में आएगी।

दूसरी बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी है जो यहां पिछले 20 वर्षों से सत्ता से बाहर रहकर चुनाव लड़ रही है। यद्यपि 2015 में हुए पिछले विधानसभा चुनावों में इसके द्वारा कांग्रेस के हाथ से  सत्ता छीनने की कोशिश की गई थी। इस बात का उल्लेख यहाँ अप्रसंगिक नहीं होगा कि भाजपा यह विधानसभा चुनाव ऐसी स्थिति में भी हार गई जबकि पूरे देश में मोदी के करिश्मे का बोल बाला था जिसके नतीजे में इनकी पार्टी भाजपा को लोकसभा चुनाव में ज़बरदस्त चुनावी सफलता मिली थी। उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के एक शक्तिशाली राजनीति के नेता के तौर पर उभरे थे जिन्हें देश की जनता ने भारी बहुमत दिया था और भारत के इतिहास में पहली बार भाजपा को अकेले बहुमत प्राप्त हुआ था। यह स्थिति भाजपा को दिल्ली का विधानसभा चुनाव जीताने में मददगार साबित नहीं हुई और केजरीवाल ने भारी अंतर से जीतकर मोदी को बौना बना दिया था। अब जबकि मोदी की करिश्माई छवि मद्धम हो रही है जिसके नतीजे में अभी हाल में कई विधानसभा चुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है तो ऐसी स्थिति में भाजपा का दिल्ली विधानसभा के जीतने की कोई संभावना नहीं है। ऐसी स्थिति में दिल्ली विधानसभा का चुनाव होने जा रहा है जिसे जीतने के लिए बीजेपी कोई कसर नहीं छोड़ रही है। जहाँ तक चुनावी मुद्दों का संबंध है तो भाजपा  के पास मतदाताओं को आकर्षित करने का कोई मुद्दा नहीं है। अपने चुनावी घोषणा पत्र में पार्टी ने दिल्लीवासियों को 2 रुपये प्रति किलो के दाम से दिल्लीवासियों को 'आटा' देने का वादा किया है। यह वादा पार्टी को चुनाव जीताने में कितना मददगार साबित होगा? यह तो वक्त ही बताएगा। वास्तव में पार्टी सांप्रदायिक मुद्दों को लेकर वोटों का ध्रुवीकरण करने का प्रयास कर रही है और यह ध्रुवीकरण 'शाहीन बाग' में महिलाओं के प्रदर्शन को लेकर किया जा रहा है जो 'नागरिकता संशोधन कानून' (सीएए) को वापस लेने की मांग को लेकर पिछले 50 दिनों से 'शाहीन बाग' में धरने पर बैठी हुई हैं। लेकिन भाजपा 'शाहीन बाग' की महिलाओं के प्रदर्शन को 'राष्ट्रविरोधी' बता रही है और मतदाताओं से इसके खिलाफ अपने पक्ष में मतदान करने की मांग कर रही है। पार्टी दिल्ली में होने वाली अपनी सभी रैलियों (लगभग 5000) में यह बताने का प्रयास कर रही है कि 'शाहीन बाग' के प्रदर्शन का मकसद देश को तोड़ना है। वास्तव में केंद्र की मोदी सरकार 'शाहीन बाग' के प्रदर्शन को खत्म कराना नहीं चाहती। जैसा कि इसने ऐलान किया है कि वो 'नागरिकता संशोधन कानून' (सीएए) के अपने स्टैंड से एक इंच भी पीछे नहीं हटेगी और 'शाहीन बाग' के प्रदर्शनकारियों से कोई बातचीत भी नहीं करेगी। भाजपा चाहती है कि ये प्रदर्शन जारी रहे ताकि वो इसका चुनावी फायदा उठा सके। चूंकि भाजपा जानती है कि उसके द्वारा दिल्ली चुनावी प्रचार के दौरान जो मुद्दें उठाए जा रहे हैं वो मतदाताओं को आकर्षित करने में सक्षम नहीं है। चुनाव के नतीजे बताएंगे कि भाजपा की यह सोच कितने सच थी? दिल्ली के मतदाताओं की आम भावना ये संकेत देती है कि दिल्ली के चुनाव के नतीजे के खेल में कोई बदलाव नहीं होगा। अर्थात भाजपा यहां चुनाव जीतकर सत्ता हासिल करने में नाकाम रहेगी। भाजपा की हार का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसने अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा तक नहीं की। ऐसा प्रतीत होता है कि दिल्ली के इस विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशाल छवि को गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ेगा। जिसके नतीजे में विशाल छवि वाले मोदी का कद मुख्यमंत्री केजरीवाल के सामने बौना हो जाएगा। यह बात यहाँ याद रखने योग्य है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 'मोहल्ला क्लीनिक' की स्थापना को दिल्लीवासियों के लिए गैर-लाभदायक बता रहे हैं जो दिल्ली के बाहर इस उद्देश्य से जाते हैं और वहां वो गंभीर तौर से बीमार हो जाते हैं क्योंकि इनका मुफ्त उचित इलाज दूसरे राज्यों के अस्पतालों में नहीं हो पाता। इस प्रकार 'मोहल्ला क्लीनिक' उन दिल्लीवासियों के लिए लाभदायक साबित नहीं होता। अगर ये दिल्लीवासी 'आयुष्मान भारत योजना' से जुड़े होते तो उन्हें दूसरे गज्यों के सरकारी अस्पतालों में मुफ्त उचित चिकित्सा सेवा का लाभ उपलब्ध होता। केजरीवाल सरकार ने 'आयुष्मान भारत योजना' को लागू न करके दिल्लीवासियों को इस योजना के लाभ को हासिल करने से वंचित किया है। ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संकुचित विचार है कि मुख्यमंत्री केजरीवाल ने 'आयुष्मान भारत योजना' को लागू न करके दिल्लीवासियों का भारी नुकसान किया है और ये आरोप लगाया है कि केजरीवाल सरकार ने 'आयुष्मान भारत योजना' को दिल्ली में न लागू कर एक बड़ा पाप किया है।

कांग्रेस पार्टी भी पूरे दमखम से दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ रही है ये यहां के मतदाताओं को हर क्षेत्र में विकास करने का वादा कर रही है। इस संबंध में वो मतदाताओं को स्व. शीला दीक्षित के नेतृत्व में चलने वाली 15 वर्षों की सरकार द्वारा किए गए विकास कार्यों की याद दिला रही है जिसके दौरान सभी क्षेत्रों में विकास कार्य हुए और आज भी ये विकास कार्य दिल्ली में नजर आ रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि दिल्ली में आज जो भी विकास कार्य नजर आ रहा है वो सब 15 वर्ष की स्व. शीला दीक्षित सरकार की देन है।


- रोहित शर्मा विश्वकर्मा


Will Kejriwal make Modi dwarf again?

Now when 1 day for polling of Delhi Assembly Elections is to remain, there is no clear indication pointing out which party will win the elections? As all of us know that there are three Political parties namely Aam Aadmi Party (AAP), Bharatiya Janata Party (BJP) & Indian National Congress (INC) are in the Fray. The ruling party AAP is contesting the elections on the dint of the works which have been done by its government during the last five years which BJP is contesting these elections pointing out the failures of AAP government and the Congress is attracting the Delhi voters by reminding the development works done by the Late Shiela Dikshit government during its 15 years tenure.

As far as AAP is concerned majority of the Delhities are of the opinions that the AAP government has provided many facilities which have not been provided by any earlier government such as in the field of education, it has a remarkable job. The Quality of education in the government school has been improved to the standard of Public School. In addition to it AAP government arranged admissions for poor students in private schools. It compelled the management of private school to get admitted a certain percentage of students of Economic Weaker Section (EWS). It ensured the electric supply for 24 hours uninterruptedly and clean drinking water supply for all Delhities. In the field of Health services the AAP government ameliorated the deteriorating situation of the Hospitals and ensured the proper distribution of medicines to the Patient. Not only the maximum medical facilities to the Patients should be provided. The most praiseworthy step in the field of Medical services of this government is to open 'Mohalla Clinics' with the aims of providing Medical helps at the doors of Delhities. It is to be remembered that the step of opening of 'Mohalla Clinics' was praised on international level. This government did not remain lagging behind of its promises of developing infrastructure in Delhi. Although, this government did not get constructed any new flyover in Delhi, but it got constructed roads and street roads in all over Delhi. It brought better system of lightning of street light in all over Delhi. Under this government every corner of Delhi has been lighted up which reduced the crimes in Delhi such as Chain Snatching, Crime relating Women, house breaking etc. The installation of 1.5 lacs Closed Circuit Television (CCTV) Cameras in all over Delhi have played a greater role in curbing henious crimes. It is a laudable step of this government. The Kejriwal government had been providing free bus service to women and in future too this facility will be continued. The Senior Citizens of Delhi have been given free travelling to places of Pilgrims by the Kejriwal government. The People's of Delhi also admitt it that the Kejriwal government is the first government of Delhi which provided free of corruption administration. All these achievements of the Kejriwal government have won hearts of Delhities, so they openly praised it. It is the reason that the Kejriwal government is contesting these elections on the basis of report and of achievements of its government. Now it promises about providing 10  facilities guarantidely in coming days. These facilities are related with day to day life.   
       
The Chief Minister Arvind Kejriwal spokes that Delhities will support his party strongly resulting in the AAP will come to power again.

The Main opposition party in the Delhi Assembly Elections is the BJP which is out of power here for the last 20 years. Although, it tried its best to snatch the power from the hand of Congress in the last assembly elections held in 2015. It will be not irrelevant to mention here it that the BJP last 2015 assembly elections instead of favourable atmosphere found in all over country. At that time Prime Minister Narendra Modi had emerged as a powerful leader of the country and in his leadership the country strongly supported his party won the Parliamentry elections with thumping majority first time in the history of India. This situation did not help BJP to win the Assembly Elections and Kejriwal had made Modi dwarf by defeating with a big difference. Now when the charismatic image of Modi has been diminishing resulting in his party has lost many assembly elections held recently. In this situation Delhi Assembly Elections are being held in which BJP has not being leaving any stonned unturned for winning the elections. As far as the elections issues are related to the BJP has no such any issue which attracts Delhities. In its election manifesto, the party had promised to provide Flour (Atta) at the price of 2 Rs/Kg. How much this promise will be able to get the party won the assembly elections? The Party is polarising its votes on the communal issues like 'Shaheen Bagh' demonstration being held by ladies of the localities demanding the return of 'Citizenship Amendment Act' (CAA). The BJP had been calling it an Anti-nation demonstration and asking votes for saving the country from these Anti-national women. In all election rallies (near about 5000) the issue of 'Shaheen Bagh' demonstration has been raising and trying to make understand his voters that the 'Shaheen Bagh' demonstration is meant to break the country. In fact the Central Government of Modi does not want to get end this demonstration. As it has announced not to budge even a single inch from its stand on CAA. The BJP wishes the demonstration should be continued, so that it could take election related advantage. Since the BJP understands that the issues raised by it in the Delhi Assembly Elections can attracts the voters. The results of the Assembly elections will show how much the BJP is right about its calculation? The general feelings of the voters of Delhi indicates towards unchanging of power game. It means the BJP will not be able to gain power here once again. The clear indication of defeat of the BJP is not the announcement of its Chief Minister candidate of Delhi. It seems that tall image of Prime Minister Narendra Modi is going to face embarrassment and become a dwarf Politician in comparison of Kejriwal. It should be remembered that Prime Minister Modi had attacked on the establishment of 'Mohalla Clinic' saying it will be unuseful for those Delhities who go to out of Delhi and they become seriously ill such a Delhities cannot be properly treated in Hospitals of other states. Thus the 'Mohalla Clinic' will not be useful for Delhities. But if Delhities are associated with the 'Ayushman Bharat' skim, they would be benefitted of this skim in other states too. The Delhi government of Kejriwal has stopped Delhities from getting benefits of health services of 'Ayushman Bharat' skim. It is a narrow thinking of Prime Minister Modi who calls establishment of 'Mohalla Clinic' in Delhi by Kejriwal government as unuseful for Delhities and alleges that Kejriwal government had committed a major sin by not implementing the 'Ayushman Bharat' skim in Delhi which could be proved for poor people of Delhi in connection of health services.         

The Congress party is also the fray of Delhi assembly elections which has been luring voters of Delhi for giving them the government which is focus on multi-dimensional development seen in the region of Late Shiela Dikshit. No doubt Delhi had seen all kinds of developments during 15 years of tenure of Late Shiela Dikshit government, whatever developments in Delhi are seen, these are results of attempts of Shiela government.


- Rohit Sharma Vishwakarma

क्या यह देश अमित शाह के बाप का है?

जबसे 'नागरिकता संशोधन कानून'(सीएए) और 'राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर'(एनआरसी) का मुद्दा प्रकाश में आया है, तब से पूरा देश भ्रम में डूब गया है क्योंकि इन दोनों मुद्दों की व्याख्या लोग अपने-अपने तरीके से कर रहे हैं। जो लोग 'नागरिकता संशोधन कानून'(सीएए) और 'राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर'(एनआरसी) से संभवतः प्रभावित होंगे इन्हें अपने लिए बहुत खतरनाक समझते हैं। इनके अनुसार 'नागरिकता संशोधन कानून'(सीएए) असंवैधानिक है। इसके अलावा सभी विरोधी पार्टियां इसे असंवैधानिक मानती हैं। यहां हमें जान लेना चाहिए कि 'नागरिकता संशोधन कानून'(सीएए) क्या है? केंद्रीय सरकार द्वारा संसद से पारित कराया गया यह कानून उन हिंदुओं को भारतीय नागरिकता देने के लिए है जो अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से धार्मिक उत्पीड़न के कारण भागकर भारत आए हुए हैं। इस कानून के दायरे से उपरोक्त देशों से आए हुए या आने वाले मुसलमानों को नागरिकता देने से बाहर रखा गया है। वास्तव में इस कानून से फिलहाल असम में रहने वाले उन 14 लाख हिंदू शरणार्थियों को फायदा मिलेगा जो 1971 में भारत-पाक युद्ध के समय धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत भाग आए थे और जिसके बाद नए देश बांग्लादेश का जन्म हुआ था। उस समय लाखों मुसलमान भी पूर्वी पाकिस्तान से भागकर भारत आ गए थे। असम में इन शरणार्थियों को भारत से निकालने के लिए एक लंबा अभियान चलाया गया और इसके लिए एक उपयुक्त कानून बनाने की मांग की गई। सबसे पहले सरकार ने असम में रहने वाले सभी शरणार्थियों की पहचान की गई और इस प्रक्रिया में कुल 19 लाख शरणार्थियों की पहचान की गई जिनमें 14 लाख हिंदू और 5 लाख मुस्लिम शामिल हैं। इन 19 लाख लोगों के पास भारत में रहने के लिए कोई सरकारी दस्तावेज नहीं हैं। इस वक्त इन शरणार्थियों को भारत से निकालने का खतरा मंडरा रहा है। यहां यह बात याद रखने योग्य है कि इन शरणार्थियों की पहचान के लिए 'राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर'(एनआरसी) सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर बनाया गया। यद्यपि इन घुसपैठियों की पहचान हो चुकी है लेकिन इन्हें देश से अभी तक निकाला नहीं गया है और अब मोदी सरकार ने असम में रहने वाले हिंदू शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने के लिए 'नागरिकता संशोधन कानून'(सीएए) बनाया। लेकिन इस कानून ने देशभर में गुस्से का माहौल पैदा कर दिया क्योंकि इस कानून को सही सोच वाले लोग पक्षपातपूर्ण और असंवैधानिक बता रहे हैं। उनका मानना है कि इस कानून के दायरे में मुसलमानों को बाहर रखना बहुत ही आपत्तिजनक है। अभी तक कोई ऐसा कानून नहीं बना है जो भारतीय नागरिकों के बीच हिन्दू-मुसलमानों के तौर पर देखता है। सभी कानून भारतीय नागरिकों को भारतीय नागरिक के तौर पर देखता है ना कि हिन्दू-मुसलमानों के रूप में। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह इसे तानाशाही वाला कानून नहीं समझते। बल्कि वे इसे प्रजातांत्रिक कानून मानते हैं। सभी कानून विशेषज्ञ और संवैधानिक विशेषज्ञ यह मानते हैं कि सरकार का यह कदम तानाशाही वाला कदम है और इसको वापस लेने की मांग की जा रही है। इस मुद्दे पर पुरे देश में बवाल मचा हुआ है जिसके नतीजे में हिंसक घटनाएं घट रही है जिसमें दर्जनों लोग पुलिस की फायरिंग में मारे गए हैं। प्रदर्शनकारी अपने आंदोलन को रोकने के लिए उस वक़्त तक तैयार नहीं हैं जब तक उनकी मांगे नहीं पूरी हो जाती हैं। ये लोग विशेषकर असम के उन 14 लाख हिन्दू शरणार्थियों को और फिर अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए हिन्दू शरणार्थियों को इस कानून के तहत भारत की नागरिकता दिए जाने का विरोध कर रहे हैं। यह बात याद रखने योग्य है कि असम में आए हुए घुसपैठियों और अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता बिना किसी वैध दस्तावेज न रखने के बावजूद दिया जाएगा। असम में रहने वाले शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दिए जाने का इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि वे समझते हैं कि ऐसा करने से उनके साहित्य, उनकी संस्कृति, उनके रहन-सहन, उनके रीति-रिवाज़ और उनका समाज विशुद्ध हो जाएगा। उनका कहना है कि जब 19 लाख शरणार्थियों (मुस्लिम समेत) की पहचान हो गई है तो असम से उन्हें हर हाल में निकाल दिया देना चाहिए क्योंकि ये लोग इस अपनी मांग को पूरा किए जाने के लिए लम्बे समय से आंदोलन चला रहे हैं। अब ये लोग इन शरणार्थियों को केंद्र सरकार द्वारा भारत की नागरिकता दिए जाने का विरोध कर रहे हैं। इस मामले पर अगर केंद्रीय सरकार असम में रह रहे 14 लाख हिन्दू घुसपैठियों को भारत की नागरिकता की योजना पर आगे बढ़ती है तो आने वाले समय में हिंसक हालात पैदा होने की संभावना है। जहाँ तक 5 लाख मुस्लिम घुसपैठियों का सवाल है तो केंद्रीय सरकार ने उन्हें असम से निकाल देने का फैसला कर लिया है। यह मुस्लिम और हिन्दू घुसपैठियों के बीच खुला भेदभाव है। ना सिर्फ यह बल्कि लाखों रोहिंग्या मुसलमान भी म्यांमार में धार्मिक उत्पीड़न के कारण भागकर भारत आए हुए हैं और यहाँ शरण ले रखी है लेकिन इन रोहिंग्या मुसलमानों को नागरिकता संशोधन कानून के तहत भारत की नागरिकता नहीं दी जा रही है। यह विडंबना की बात है कि इस नए कानून के तहत अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिन्दू नागरिकों को भारत की नागरिकता दी जाएगी, अगर वो इसके लिए आवेदन करते हैं। इस तरह इन तीनों देशों के हिन्दुओं के सैलाब को भारत में आने का दरवाज़ा खोल दिया गया है।

गृहमंत्री अमित शाह खुद यह बात स्वीकारते हैं कि इस कानून के बन जाने के बाद अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लगभग 4 करोड़ हिन्दू अपने-अपने देश की नागरिकता छोड़कर भारत आ जाएंगे। दरअसल गृहमंत्री अमित शाह का यही इरादा है कि उपरोक्त देशों के हिन्दुओं को भारत बुला लिया जाए और इस बात का एलान उन्होंने इस कानून को संसद से पारित कराने के दौरान सदन में किया था। अगर यह हुआ तो इसका परिणाम क्या निकलेगा? जैसा कि हम जानते हैं कि हमारी आर्थिक व्यवस्था इतनी मजबूत नहीं है कि वो उपरोक्त देशों से आने वाले हिन्दुओं को उपरोक्त देशों से उपरोक्त संख्या में भारत आने वाले हिन्दुओं को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करा सकें। हम पहले से ही बेरोज़गारी, गरीबी, महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, अच्छी शिक्षा, ढांचागत सुविधाओं की कमी, घरों की कमी, शिक्षा संस्थानों के लिए भवनों की कमी, पीने के पानी की उपलब्धता की कमी आदि समस्याओं का सामना कर रहे हैं। ऐसी स्थिति केंद्र सरकार उपरोक्त देशों से भारत आने वाले लगभग 4 करोड़ हिन्दुओं को ये बुनियादी सुविधाएं कैसे उपलब्ध कराएंगी। यह निश्चित है कि देशवासियों द्वारा सामना किए जाने वाली इन समस्याओं का तब और कई गुणा इजाफ़ा हो जाएगा। यह आश्चर्य की बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह इस मामले पर खामोश हैं। ये दोनों अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से धार्मिक उत्पीड़न के कारण आए या वहां धार्मिक उत्पीड़न को सहन कर रहे हिन्दुओं से प्रेम और उनकी स्थिति से चिंतित होने की भावना का प्रदर्शन कर रहे हैं और स्वयं को इन उत्पीड़ित हिन्दुओं का उद्धारक समझते हैं। हमारे पास मौजूदा आबादी के लिए अनाज, घर और नौकरियां उपलब्ध कराने की व्यवस्था नहीं है। दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को देश के विकास की और देश की समस्याओं को हल करने की कोई चिंता नहीं है। जबसे नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई है इसने विकास के क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया है। इसलिए यह सरकार अपनी असफलता को छिपाने के लिए 'नागरिकता संशोधन कानून'(सीएए) जैसे संवेदनशील मुद्दे की ओर देशवासियों का ध्यान भटका रही है। इस वक़्त देश खुलकर दो वर्गों में बंट गया है। एक इस कानून के समर्थक वर्ग और दूसरा इसका विरोध करने वाला वर्ग। इसका समर्थन करने वाले कट्टर हैं और इसका विरोध करने वाले सही सोच वाले भारतीय है। दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की इस कानून को लागू करने की मंशा यह है कि अपने हिन्दुत्वा वोट बैंक का विस्तार किया जाए।

वास्तव में इस कानून का विरोध अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से करोड़ों हिन्दुओं को भारत लाने और यहाँ के करोड़ों नागरिकों की नागरिकता को छीनने के डर से किया जा रहा है। यद्यपि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह द्वारा यह आश्वासन दिया जा रहा है कि इस कानून से किसी भारतीय नागरिक को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। ये कानून अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले हिन्दुओं को सिर्फ भारत की नागरिकता दिए जाने से संबंधित है। परन्तु लोग इन बयानों पर नरेंद्र मोदी सरकार और इसके नेताओं की 'दोहरी ज़बान' की वजह से इनके बयानों पर विश्वास नहीं कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की 'दोहरी ज़बान' का उदाहरण 2014 के लोकसभा चुनाव के समय किए गए चुनावी वादे हैं जब यह कहा गया था कि सत्ता में आने के बाद देश का विदेशों में जमा काला धन वापस लाया जाएगा, हर नागरिक के खाते में 15 लाख रुपए जमा कराए जाएंगे, हर वर्ष बेरोज़गारों को 2 करोड़ नौकरियां दी जाएंगी, महंगाई पर रोक लगाई जाएगी। नरेंद्र मोदी द्वारा 2014 के चुनावों के अवसर पर भारत की जनता से किए गए उक्त चार बड़े वादों के आलावा और बहुत से वादे भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) के चुनावी घोषणा पत्र में किए गए थे। केंद्र में सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन सभी वादों को भूल गए और इस प्रकार देश की जनता को मूर्ख बनाया। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने अपने उक्त वादों को आज तक पूरा न करने के लिए देश की जनता से खेद तक न व्यक्त किया। क्या इन दोनों द्वारा देश की जनता से की गई इस खुली वादाखिलाफ़ी को उनके विश्वास को धोखा देना नहीं कहा जाएगा? इस प्रकार हम प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के इन बयानों पर कैसे विश्वास कर सकते हैं कि 'नागरिकता संशोधन कानून'(सीएए) किसी भी भारतीय नागरिक के लिए किसी भी तरह से हानिकारक नहीं है और 'राष्ट्रिय नागरिक रजिस्टर'(एनआरसी) को भविष्य में लागू नहीं किया जाएगा।

यह याद रखने योग्य है कि 'नागरिकता संशोधन कानून'(सीएए) और 'राष्ट्रिय नागरिक रजिस्टर'(एनआरसी) भारत के मुसलमानों, दलितों, आदिवासियों, सभी समुदायों के निर्धन लोगों के लिए बहुत खतरनाक है क्योंकि ये सभी लोग भारत की नागरिकता से संबंधित कानूनी दस्तावेज उपलब्ध कराने में असमर्थ होंगे। यही कारण है कि 'नागरिकता संशोधन कानून'(सीएए) 'राष्ट्रिय नागरिक रजिस्टर'(एनआरसी) का विरोध करने वालों में मुसलमान, दलित, आदिवासी, सभी निर्धन लोग शामिल हैं। इसके अलावा इनका विरोध करने वालों में पढ़े-लिखे लोगों की भारी संख्या है जिनमें छात्र, अध्यापक, प्रोफेसर, अधिवक्ता, बुद्धिजीवी आदि शामिल हैं जो इनके दुष्परिणामों को अच्छी तरह जानते हैं।

जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह यह दावा कर रहे हैं कि इनका विरोध अनपढ़ लोग कर रहे हैं जो इनके बारे में कुछ नहीं जानते। वास्तव में 'नागरिकता संशोधन कानून'(सीएए) और 'राष्ट्रिय नागरिक रजिस्टर'(एनआरसी) हमारे देश के लिए किसी भी हालत में लाभकारी नहीं है और ये हम सभी के लिए अहितकर है इसलिए इसका समर्थन किसी भी हालत में नहीं जाना चाहिए।

यहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के इस बयान का उल्लेख अप्रसंगिक नहीं होगा कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दूसरे नेताओं ने 'नागरिकता संशोधन कानून'(सीएए) बनाने 'राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर'(एनआरसी) लागू करने की ज़रूरत की वकालत की थी। निःसंदेह ये नेता भी चाहते थे कि 'नागरिकता संशोधन कानून'(सीएए) जैसा कानून और प्रस्तावित 'राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर'(एनआरसी) को लागू किया जाए लेकिन अगर यें लोग 'नागरिकता संशोधन कानून'(सीएए) और प्रस्तावित 'राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर'(एनआरसी) लागू करते तो वो मौजूदा 'नागरिकता संशोधन कानून'(सीएए) से बिलकुल भिन्न होता क्योंकि उसके दायरे से किसी समुदाय को बाहर नहीं रखा जाता। चूँकि 'नागरिकता संशोधन कानून'(सीएए) बनाने का मकसद अच्छा नहीं है इसलिए इस कानून के लागू होना का नतीजा बुरा ही होगा।


- रोहित शर्मा विश्वकर्मा

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